बनारस की गलियों में खोया कैनवस बॉल क्रिकेट का दौर
बनारस के हर छोटे बड़े मैदान से लेकर काशी के घाटों तक छाया रहता था कैनवस बाल क्रिकेट का जुनून
वक़्त और मोबाइल की आँधी में सब खत्म, अब यादें ही बची है
वाराणसी। काशी की संकरी गलियों और घाटों की आध्यात्मिकता के बीच कभी एक और धड़कन गूंजा करती थी—कैनवस बॉल क्रिकेट की। वह दौर था जब शहर के हर मैदान, हर अंचल की खुली जगहें क्रिकेट के उत्सव से सजी रहती थीं। टेनिस बॉल को कैनवस बॉल कहकर पुकारते हुए बच्चे, युवा और बड़े सब मैदान पर उतर आते। दिन हो या रात, टूर्नामेंटों का सिलसिला चलता रहता। नाइट क्रिकेट के मैच तो अलग ही रौनक लाते—फ्लडलाइट्स की रोशनी में गेंद की उड़ान और बल्ले की ध्वनि गंगा की लहरों से टकराती हुई लगती।
उस समय बनारस क्रिकेट का गढ़ था। शहर के प्रमुख मैदानों से लेकर दूरदराज के गांवों तक कैनवस बॉल टूर्नामेंट आयोजित होते। स्थानीय क्लबों और मोहल्लों की टीमें आपस में भिड़तीं। पुरस्कार छोटे-मोटे होते—कभी ट्रॉफी, कभी नकद इनाम—लेकिन उत्साह इतना कि हजारों दर्शक जुट जाते।
बच्चे स्कूल से लौटते ही बैग फेंककर मैदान की ओर दौड़ पड़ते। शाम ढलते ही नाइट मैच शुरू हो जाते, जहां थके-हारे मजदूर भी शामिल होकर दिन भर की थकान भूल जाते। यह क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं था, बल्कि बनारस की सामाजिक जीवनशैली का हिस्सा बन चुका था। मोहल्लों की एकता, दोस्ती और प्रतिद्वंद्विता सब इसी मैदान पर साकार होती।

उस दौर के सितारे आज भी कई लोगों की यादों में जीवित हैं। धर्मेंद्र मिश्रा, जिन्होंने अपनी तेज गेंदबाजी और आक्रामक बल्लेबाजी से रेलवे तक का सफर तय किया। नसीर अली, अवधेश श्रीवास्तव उर्फ लवली, जीशान जाफरी की स्टाइलिश बैटिंग देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती। अब्दुल गनी, अफसर, मेहताब, सरोज राय, प्रमोद राय और प्रकाश यादव जैसे खिलाड़ी बनारस की क्रिकेट की पहचान थे। ये खिलाड़ी स्थानीय टूर्नामेंटों से निकलकर बड़े स्तर पर पहुंचे। उनके मैचों में दर्शकों की भीड़ उमड़ती, तालियां गूंजतीं और जीत के जश्न में पूरी गली जगमग हो उठती। ये नाम आज भी पुराने क्रिकेटप्रेमियों की जुबान पर हैं, जो बताते हैं कि कैसे इन खिलाड़ियों ने कैनवस बॉल से शुरू करके बनारस का नाम रोशन किया।
लेकिन समय बदला। वह सुनहरा दौर अब अतीत की किताबों में सिमट गया है। आज वाराणसी के मैदान खाली पड़े हैं या फिर पार्किंग में तब्दील हो चुके। बच्चे अब बल्ला-गेंद हाथ में लेने की बजाय मोबाइल स्क्रीन पर उंगलियां फेरते नजर आते हैं। पबजी, फ्री फायर और सोशल मीडिया की दुनिया ने क्रिकेट की जगह ले ली है।
जहां कभी नाइट टूर्नामेंटों की रौनक होती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। पुराने खिलाड़ी आज भी अफसोस जताते हैं कि नई पीढ़ी मैदान से दूर हो गई। शारीरिक खेल की बजाय वर्चुअल गेम्स ने बच्चों को घरों में कैद कर दिया।

हालांकि उम्मीद की किरण बाकी है। वाराणसी में नया अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम बन रहा है, जो जल्दी ही तैयार हो जाएगा। शायद यह नई सुविधा फिर से क्रिकेट की लौ जला दे। लेकिन कैनवस बॉल का वह लोकल उत्साह, वह मोहल्लाई रौनक लौट आएगी? पुराने क्रिकेटप्रेमी यही सवाल पूछते हैं।
बनारस की यह क्रिकेट विरासत आज भावुक यादों में सांस ले रही है—एक दौर जो गुजर गया, लेकिन दिलों में बसा हुआ है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार अरशद आलम







Users Today : 16
Users Yesterday : 143