उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ाने की मुहिम :खेतों में उतरे वैज्ञानिक, रासायनिक उर्वरकों की खपत घटाने का लक्ष्य
आइआइवीआर वैज्ञानिकों की 8 टीमें गाँवों में सूक्ष्मजीव जैव-उर्वरक किट और लाइव डेमो दे रहीं
रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के विरुद्ध आइसीएआर के राष्ट्रव्यापी अभियान का हिस्सा
आईआईवीआर | वाराणसी | 16 मई 2026
भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान की आठ वैज्ञानिक टीमें पूर्वांचल के गाँव-गाँव में पहुँच रही हैं — खेतों और चौपालों पर शिविर लगाकर, संवाद और प्रदर्शन करके, संतुलित उर्वरक उपयोग के पर्चे वितरित करके और सूक्ष्मजीव जैव-उर्वरक किट देकर किसानों को प्रेरित कर रहीं हैं। अधिकारी इसे भारतीय खेती को रासायनिक उर्वरकों की महँगी निर्भरता से मुक्त करने के अभियान की अंतिम और निर्णायक कड़ी बता रहे हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के नेतृत्व में चल रहे इस राष्ट्रव्यापी अभियान के तहत अब तक 2,500 से अधिक किसानों तक पहुँचा जा चुका है और यह 30 जून तक जारी रहेगा।
आँकड़े जो सब कुछ बताते हैं

मिट्टी की संतुलित सेहत के लिए नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटाश का आदर्श अनुपात 4:2:1 है। देश का राष्ट्रीय औसत बढ़कर 9.3:3.5:1 हो चुका है — एक ऐसा रासायनिक असंतुलन जो खेतों की जैविक जीवन-शक्ति को धीरे-धीरे खोखला कर रहा है। आर्थिक बोझ भी उतना ही गंभीर है: 2023-24 में देश ने 70.42 लाख मीट्रिक टन यूरिया का आयात किया, जिसका खर्च सरकारी खजाने पर भारी पड़ा। किसानों के खेतों में अत्यधिक उर्वरकों के परिणाम चुपचाप जमा होते जा रहे हैं — खराब होती मिट्टी, घटती उपज, खाने में रासायनिक अवशेष, बढ़ती लागत तथा सिकुड़ते मुनाफे के जाल में फँसती खेती।
“इस अभियान से जुड़कर सूक्ष्मजीव जैव-उर्वरकों को अपनाने से किसान रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता 25 प्रतिशत तक घटा सकते हैं । इसका अर्थ है किसान की उत्पादन लागत में सीधी कमी और देश पर उर्वरक अनुदान का कम बोझ ।”
— डॉ. डी.पी. सिंह, प्रधान वैज्ञानिक, IIVR, वाराणसी
सूक्ष्मजीव किट, जीवंत प्रदर्शन, मृदा स्वास्थ्य पर्चे
हर शिविर में आइआइवीआर के वैज्ञानिक सिर्फ बातें नहीं करते। वे मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के अंतर्गत तैयार मिट्टी जाँच रिपोर्ट को खोलकर समझाते हैं — पीएच मान, जीवांश (आर्गेनिक) कार्बन, एनपीके और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की जानकारी क्यों जरूरी है, यह किसान को उसकी भाषा में बताया जाता है। हर किसान एक व्यक्तिगत उर्वरक परामर्श लेकर लौटता है — उसके खेत की असली जरूरत के हिसाब से, न कि किसी एक जैसी सामान्य सिफारिश के आधार पर।
किसानों को वितरित किए जा रहे जैव-उर्वरक उत्पादों में शामिल हैं, काशी एज़ोबीसी, आइआइवीआर का एनपीके सूक्ष्मजीव कंसोर्टियम जिससे एक ही उत्पाद में नाइट्रोजन स्थिरीकरण के साथ फॉस्फोरस और पोटाश उपलब्धता बढ़ती है और साथ ही यूरिया, डीएपी और एम्ओपी तीनों की खपत को घटाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त नाइट्रोजन के लिए नाइट्रोफिक्स- एजोटोबैक्टर आधारित अनुकल्प है, फोस्फोमिक्स (पीएसबी) मिट्टी में जड़ अघुलित फॉस्फोरस को जड़ों के लिए उपलब्ध बनाता है और डीएपी के उपयोग को घटा सकता है। पोटामैक्स (केएमबी) पोटाश गतिशीलता बढ़ाने वाला जीवाणु अनुकल्प है जो पोटाश उपलब्धता को सुधारता है और जेडएसबी जिंक-एक्टिव (जिंक) जस्ता-घोलक जीवाणु अनुकल्प जो सब्जी फसलों में जिंक की कमी और पत्ती पीलापन का जैविक समाधान के रूप में है. इनके साथ-साथ जैव-उत्प्रेरक काशी बायोमिक्स, काशी सालएस्कोवीटा एवं ग्रोविट प्लस भी वितरित किए जा रहे हैं। ये जड़ विकास, तनाव सहनशीलता और उपज की गुणवत्ता में सुधार करते हैं। डॉ सिंह कहते हैं कि जैव उत्प्रेरक (बायोस्टिमुलेंट) सरकार के द्वारा 2025 में गजट किये गए हैं और फसल उत्पादन को बढाने के लिए वैकल्पिक संसाधन हैं ।
कीटनाशकों का जैविक जवाब
प्रधान वैज्ञानिक डॉ. के.के. पाण्डेय और वैज्ञानिक अनुराग चौरसिया इन्हीं शिविरों में जैव-नियंत्रण एजेंट भी उपलब्ध करा रहे हैं । एक्टिनोगार्ड जड़ गलन और उकठा जैसे मृदाजनित रोगों पर काबू पाने में मददगार है, ट्राईकोडर्मा फ्यूजेरियम और राइजोक्टोनिया सहित फफूंद रोगजनकों को नियंत्रित करता है; और बैसिलस सीआरबी-7 जड़-गाँठ सूत्रकृमि का प्रबंधन करता है जिससे रासायनिक कीटनाशक एवं फफूंदनाशक के उपयोग को कमतर किया जा सकता है। “रासायनिक कीटनाशकों और फफूंदनाशकों का बेतहाशा बढ़ता उपयोग भी हमारी मिट्टी के स्वास्थ्य और हमारे भोजन की गुणवत्ता और पोषकता के लिए खतरनाक संकेत है,” डॉ. पाण्डेय ने कहा। “ये उत्पाद प्रकृति के साथ काम करते हैं, उसके खिलाफ नहीं।”
शिविर में क्या होता है
प्रधान प्रसार वैज्ञानिक डॉ. नीरज सिंह के अनुसार उत्पाद वितरण से परे हर संवाद शिविर एक जीवंत कृषक-वैज्ञानिक कक्षा है। वैज्ञानिक रासायनिक और जैव-उर्वरकों के गुणधर्म सिर्फ बताते नहीं, दिखाते भी हैं। जैव-उर्वरक जीवाणुओं और फफूंदों को बड़ी मात्र में कल्चर करना, और गुणवत्ता नियंत्रण की विधि सिखाई जाती है जिसके कुछ सामान्य पहलुओं को किसान स्वयं दोहरा सकते हैं। सूक्ष्मजीव कालोनियों की गिनती ‘जिंदा मिट्टी’ का प्रत्यक्ष प्रमाण किसान की आँखों के सामने रखती है। ड्रिप-फर्टिगेशन डेमो में दिखाया जाता है कि प्रति एकड़ 2.5 लीटर तरल जैव-उर्वरक पूरे खेत में कैसे पहुँचता है और पानी व मजदूरी दोनों बचाता है। सब्जी अवशेषों को जैव-उर्वरकों और ट्राइकोडर्मा के साथ मिलाकर 50-60 दिन में रोगाणु-मुक्त कम्पोस्ट बनाना भी यहाँ सिखाया जाता है।
“ किसानों से आग्रह है कि वे शिविरों में आएँ, अपनी मिट्टी को पहचानें, जानें कि अत्यधिक रसायनों से उसके प्राकृतिक गुण कैसे बदल रहे हैं और यह समझें कि मिट्टी को जीवित रखने के क्या विकल्प उपलब्ध हैं। यह उनकी जमीन और खेतों, उनके परिवार की सेहत और बच्चों के भविष्य से सीधे जुड़ा मामला है।”
— डॉ. राजेश कुमार, निदेशक,आईआईवीआर, वाराणसी*
किसान क्या उम्मीद रखें?
शिविरों में आए और उत्पाद अपनाने वाले किसानों को बताया जा रहा है कि यूरिया और डीएपी की कम खपत से उत्पादन लागत में समय के साथ 20-25% की कमी आएगी। पूर्वांचल के अधिकांश खेतों में जीवांश कार्बन अभी मात्र 0.3% है — लगातार जैव-उर्वरक उपयोग से यह 0.5-0.6% तक पहुँच सकता है, जिससे मिट्टी की जल-धारण क्षमता दोगुनी हो जाएगी।
रसायन-मुक्त एवं दिखने में उत्तम सब्जी को मंडी और होटल सप्लाई चेन में प्रीमियम दाम मिलता है — यह लागत बचत से परे एक सीधी अतिरिक्त आय है।
आइआइवीआर के निदेशक डॉ. राजेश कुमार ने कहा कि उनकी टीमें गाँव-गाँव पहुँच रही हैं। उन्होंने किसानों से ‘खेत बचाओ’ पहल से जुड़ने, गाँव स्तर पर जागरूकता फैलाने और स्थानीय जैव-इनपुट बैंक तथा सामूहिक विपणन समूह बनाने का आग्रह किया। आइआइवीआर ने कहा कि मिट्टी को स्वस्थ, सब्जी उत्पाद को सुरक्षित और मानव स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के उद्देश्य से यह अभियान आगे भी जारी रखा जाएगा।







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