साइबर ठगों पर यूपी पुलिस का डिजिटल प्रहार, रकम फ्रीज कराने में राष्ट्रीय औसत से आगे निकला प्रदेश
सितंबर में साइबर ठगी की 34 प्रतिशत धनराशि फ्रीज कराने में मिली सफलता, राष्ट्रीय औसत 31 प्रतिशत; 84 हजार जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को किया गया सतर्क
लखनऊ। साइबर अपराधियों के बढ़ते जाल पर शिकंजा कसने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस ने तकनीक को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश में साइबर अपराधों की रोकथाम के साथ ही ठगी के बाद पीड़ितों की धनराशि को सुरक्षित रखने और वापस दिलाने के प्रयासों में तेजी आई है। इसी का परिणाम है कि सितंबर में साइबर ठगी की रकम फ्रीज कराने के मामले में उत्तर प्रदेश ने राष्ट्रीय औसत को पीछे छोड़ दिया। प्रदेश में धनराशि फ्रीज कराने की दर 34 प्रतिशत रही, जबकि राष्ट्रीय औसत 31 प्रतिशत दर्ज किया गया।
साइबर अपराधियों की ओर से ठगी की रकम को चंद मिनटों में कई बैंक खातों के माध्यम से दूसरे स्थानों पर भेजने की चुनौती से निपटने के लिए साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसके माध्यम से रियल टाइम रूटिंग, डेटा साझा करने और संबंधित बैंकों के साथ समन्वय स्थापित कर ठगी की रकम को तत्काल फ्रीज कराने का प्रयास किया जा रहा है। समय रहते कार्रवाई होने पर कई मामलों में पीड़ितों की धनराशि वापस कराने में भी सफलता मिली है। प्रदेश में साइबर अपराध के खिलाफ तकनीकी संसाधनों के विस्तार और पुलिसकर्मियों के प्रशिक्षण से कार्रवाई को और प्रभावी बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
Mn pp साइबर ठगी की रकम पर रियल टाइम निगरानी
साइबर अपराध के मामलों में सबसे बड़ी चुनौती ठगी की रकम को दूसरे खातों में स्थानांतरित होने से रोकना है। जालसाज रकम प्राप्त करते ही उसे अलग-अलग खातों में भेजने लगते हैं, जिससे उसकी पहचान और बरामदगी मुश्किल हो जाती है। ऐसे में साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर के माध्यम से शिकायत मिलने के बाद संबंधित बैंक से संपर्क कर धनराशि को रोकने की प्रक्रिया शुरू की जाती है।
रियल टाइम रूटिंग और डेटा साझा करने की व्यवस्था के जरिए संदिग्ध लेनदेन की जानकारी संबंधित संस्थानों तक पहुंचाई जाती है। इससे ठगी की रकम को समय रहते फ्रीज कराने और पीड़ितों को आर्थिक नुकसान से बचाने में मदद मिलती है। अधिकारियों के अनुसार, समयबद्ध कार्रवाई के चलते कई मामलों में निर्धारित समय सीमा के भीतर शत-प्रतिशत तक धनराशि की रिकवरी भी दर्ज की गई है।
84 हजार जागरूकता अभियानों से साइबर अपराध के प्रति किया सतर्क
साइबर ठगी पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस की कार्रवाई केवल अपराधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि आम लोगों को जागरूक करने पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। प्रदेश में अब तक 84 हजार साइबर जागरूकता अभियान चलाए गए हैं। इनके माध्यम से लोगों को फिशिंग, फर्जी वेबसाइट, डेटा चोरी, फर्जी अप्रूवल और डिजिटल माध्यम से होने वाली धोखाधड़ी के विभिन्न तरीकों की जानकारी दी गई।
सिनेमा हॉल, रेलवे स्टेशन समेत सार्वजनिक स्थानों पर अभियान चलाकर लोगों को ऑनलाइन लेनदेन के दौरान सतर्क रहने के लिए जागरूक किया गया। साथ ही किसी भी वेबसाइट, लिंक या डिजिटल प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता की जांच करने और अनजान व्यक्ति के साथ बैंकिंग संबंधी गोपनीय जानकारी साझा नहीं करने की अपील की गई।
पुलिस का मानना है कि साइबर अपराध के मामलों में जागरूकता ही बचाव का सबसे प्रभावी माध्यम है। यदि लोग समय रहते संदिग्ध गतिविधियों को पहचान लें तो ठगी की घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।
एआई और डीपफेक जैसी चुनौतियों से निपटने की तैयारी
तकनीक के तेजी से बदलते स्वरूप के साथ साइबर अपराधियों के तरीके भी लगातार बदल रहे हैं। अब जालसाज एआई, डीपफेक, फर्जी डिजिटल पहचान और म्यूल अकाउंट जैसे माध्यमों का इस्तेमाल कर लोगों को निशाना बना रहे हैं। इन नई चुनौतियों से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस की तकनीकी क्षमता बढ़ाने के साथ ही पुलिसकर्मियों को अत्याधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर डीजी साइबर क्राइम विनोद कुमार सिंह के नेतृत्व में साइबर अपराध से निपटने के लिए पुलिसकर्मियों को तकनीकी रूप से दक्ष बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य साइबर अपराधियों के तरीकों को समय रहते पहचानना, डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण करना और अपराधियों तक पहुंचने की प्रक्रिया को तेज करना है।
गोल्डन आवर में शिकायत से बढ़ जाती है रकम वापसी की उम्मीद
साइबर ठगी के मामलों में शुरुआती एक घंटा यानी गोल्डन आवर बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान शिकायत मिलने पर ठगी की रकम को संबंधित बैंक खाते में रोकने या फ्रीज कराने की संभावना बढ़ जाती है। एसपी साइबर क्राइम राजेश यादव ने बताया कि साइबर अपराध की घटना होने पर पीड़ित को बिना देरी किए शिकायत दर्ज करानी चाहिए।
उन्होंने बताया कि साइबर अपराधी फिशिंग लिंक, फर्जी वेबसाइट, डेटा चोरी और भ्रामक डिजिटल अप्रूवल समेत कई तरीकों से लोगों को अपने जाल में फंसाते हैं। ऐसे में किसी अनजान लिंक पर क्लिक करने, संदिग्ध एप डाउनलोड करने या अपनी बैंकिंग संबंधी गोपनीय जानकारी साझा करने से बचना चाहिए। डिजिटल लेनदेन करते समय संबंधित प्लेटफॉर्म की प्रामाणिकता की जांच करना भी जरूरी है।
उन्होंने लोगों से अपील की कि साइबर ठगी होने पर तत्काल हेल्पलाइन नंबर 1930 पर संपर्क करें और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं। जितनी जल्दी शिकायत होगी, रकम को रोकने की संभावना उतनी ही अधिक रहेगी।
हर थाने में साइबर हेल्प डेस्क, 1930 से मिल रही मदद
प्रदेश में साइबर अपराध से निपटने के लिए पुलिस की व्यवस्था को जमीनी स्तर तक मजबूत किया गया है। प्रत्येक थाने में साइबर हेल्प डेस्क की व्यवस्था की गई है, ताकि पीड़ितों को शिकायत दर्ज कराने में परेशानी न हो। वहीं, लखनऊ में संचालित 1930 कॉल सेंटर और साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर के माध्यम से शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई की जा रही है।
शिकायत प्राप्त होने के बाद संबंधित बैंक और अन्य एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित कर ठगी की रकम को रोकने का प्रयास किया जाता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य पीड़ितों को समय पर सहायता उपलब्ध कराने के साथ ही साइबर अपराधियों के नेटवर्क पर प्रभावी अंकुश लगाना है।
साइबर सुरक्षा के लिए जनभागीदारी भी जरूरी
साइबर अपराध की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। अपराधी कहीं बैठकर भी किसी दूसरे शहर या प्रदेश के व्यक्ति को अपना शिकार बना सकते हैं। ऐसे में केवल पुलिस और बैंकिंग व्यवस्था के भरोसे साइबर अपराध पर पूरी तरह अंकुश लगाना संभव नहीं है। इसके लिए समाज के प्रत्येक वर्ग की भागीदारी भी जरूरी है।
स्कूल-कॉलेज, ग्राम पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों, युवा एवं खेल क्लबों और स्थानीय संगठनों के माध्यम से साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। लोगों को डिजिटल लेनदेन के सुरक्षित तरीकों की जानकारी देने के साथ ही संदिग्ध गतिविधियों की तत्काल सूचना देने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
प्रदेश में साइबर अपराध के खिलाफ तकनीक, त्वरित कार्रवाई और जनजागरूकता को एक साथ जोड़कर मजबूत सुरक्षा तंत्र विकसित करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। सितंबर में धनराशि फ्रीज कराने की 34 प्रतिशत दर राष्ट्रीय औसत से अधिक होना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आया है।





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