संत गुरु श्री रविदास जी महाराज का समरस समाज, बाबासाहेब अंबेडकर का सामाजिक न्याय और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत का संकल्प- लाल सिंह आर्य
भारत की सांस्कृतिक चेतना का सबसे सशक्त आधार उसकी संत परंपरा रही है। जब-जब समाज विभाजन, असमानता और अन्याय से जूझा, तब-तब संतों ने समाज को नई दिशा प्रदान की। संत शिरोमणि श्री गुरु रविदास जी ऐसे ही युगद्रष्टा संत थे, जिन्होंने भक्ति को केवल ईश्वर आराधना तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक समरसता, मानव गरिमा और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाया। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने लगभग छह शताब्दी पूर्व थे। यही कारण है कि आज उनके संदेश को जन-जन तक पहुँचाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
संत रविदास जी ऐसे समय में प्रकट हुए जब भारतीय समाज सामाजिक विषमताओं और कुरुतियों से ग्रस्त था। उन्होंने अपने सरलतापूर्ण व विनम्रतापूर्ण जीवन और वाणी के माध्यम से स्पष्ट किया कि मनुष्य की पहचान उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म, गुण और चरित्र से होती है। उनका प्रसिद्ध संदेश- “जनम जात मत पूछिए, का जात अरु पात।, रैदास पूत सब प्रभु के, कोऊ नहिं जात कुजात ॥” भारतीय समाज के लिए समानता का उद्घोष था। उन्होंने “एकै माटी के सभ भांडे” कहकर समस्त मानवता की एकता का संदेश दिया और सामाजिक भेदभाव को राष्ट्र की कमजोरी बताया।
संत रविदास जी ने केवल उपदेश ही नहीं दिए, बल्कि अपने जीवन से समाज को नव चेतना दी। उन्होंने अपने पैतृक व्यवसाय को सम्मानपूर्वक अपनाया और श्रम को ईश्वर का स्वरूप बताया। “श्रम कऊ ईसर जानि कै” का उनका संदेश आज भी श्रम की गरिमा और आत्मनिर्भरता का सर्वोच्च दर्शन है। उन्होंने सिद्ध किया कि कोई कार्य छोटा नहीं होता और ईमानदार परिश्रम ही मनुष्य का वास्तविक सम्मान है।
उनका प्रसिद्ध पद “मन चंगा तो कठौती में गंगा” यह बताता है कि पवित्रता बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि मन की निर्मलता और कर्म की पवित्रता में निहित है। इसी प्रकार “बेगमपुरा ” की उनकी परिकल्पना एक ऐसे समाज की कल्पना है जहाँ भय, भेदभाव, अन्याय और अभाव का स्थान न हो तथा प्रत्येक व्यक्ति सम्मान और समान अवसर के साथ जीवन व्यतीत कर सके। यह केवल आध्यात्मिक कल्पना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का आदर्श संदेश है।
संत गुरु श्री रविदास जी महाराज का प्रभाव केवल उनके समय तक सीमित नहीं रहा। भक्त शिरोमणि मीराबाई एवं झाली रानी ने उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया और संत कबीर ने उनके व्यक्तित्व की महानता का सम्मान किया। उन्होंने यह स्थापित किया कि ज्ञान, भक्ति और मानवता किसी जाति, वर्ग अथवा जन्म की सीमाओं में नहीं बँध सकती। उनका संपूर्ण जीवन भारतीय समाज में समरसता और समानता का जीवंत उदाहरण है।

आज विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर स्थित संत रविदास जी की जन्मस्थली का व्यापक विकास इस बात का प्रमाण है कि भारत अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति गंभीर है। सरकार द्वारा लगभग ₹111.81 करोड़ की लागत से लंगर हॉल, आधुनिक जनसुविधाएँ, पार्क, संपर्क मार्ग, प्रकाश व्यवस्था, दिव्यांगजन सुविधाएँ तथा संग्रहालय जैसी अनेक परियोजनाएँ विकसित की गई हैं। इससे यह पावन
स्थल श्रद्धा, संस्कृति और पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है।
यह केवल अधोसंरचना का विकास नहीं है, बल्कि भारतीय संत परंपरा के सम्मान और सामाजिक चेतना के संरक्षण का भी प्रतीक है। जब किसी महापुरुष की जन्मस्थली विकसित होती है, तब केवल भवन नहीं बनते, बल्कि आने वाली पीढ़ियाँ अपने इतिहास, संस्कृति और मूल्यों से जुड़ती हैं।
भारतीय जनता पार्टी ने सदैव उन महापुरुषों के विचारों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने का कार्य किया है, जिन्होंने भारत की सामाजिक एकता को मजबूत किया। इसी उद्देश्य से भारतीय जनता पार्टी द्वारा देशभर में संत शिरोमणि संत गुरु श्री रविदास जी महाराज का “समरसता संकल्प अभियान” चलाया जा रहा है। यह अभियान केवल एक संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संत शिरोमणि गुरु रविदास जी के समरसता, समानता, श्रम की प्रतिष्ठा, सामाजिक न्याय और मानव गरिमा के संदेश को घर-घर पहुँचाने का राष्ट्रीय जनजागरण अभियान है। अभियान के माध्यम से कार्यकर्ता समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचकर संत रविदास जी के जीवन-दर्शन, उनके सामाजिक संदेश तथा राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को जन-जन तक पहुँचा रहे हैं। यह अभियान समाज में संवाद, सद्भाव और आत्मीयता का वातावरण निर्मित करने का भी एक सशक्त प्रयास है।

संत रविदास जी के विचारों को यदि आधुनिक भारत में किसी ने शासन की प्राथमिकताओं में स्थान दिया है, तो वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व वाली सरकार है। “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” का मंत्र संत रविदास जी की समरसता की भावना का ही आधुनिक स्वरूप प्रतीत होता है। अंत्योदय, सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के सशक्तिकरण को केंद्र में रखकर अनेक ऐतिहासिक निर्णय लिए गए हैं।
प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से करोड़ों गरीब परिवारों को पक्का घर मिला है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने गरीब माताओं-बहनों को धुएँ से मुक्ति दिलाई। आयुष्मान भारत योजना ने करोड़ों परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान की। प्रधानमंत्री जनधन योजना ने आर्थिक समावेशन का नया अध्याय लिखा। हर घर जल, स्वच्छ भारत मिशन, पीएम विश्वकर्मा योजना, पीएम स्वनिधि, स्टैंड-अप इंडिया, मुद्रा योजना, कौशल विकास अभियान था। अनुसूचित जाति एवं वंचित समाज के शैक्षिक एवं आर्थिक सशक्तिकरण से जुड़ी अनेक योजनाएँ सामाजिक न्याय को धरातल पर उतारने का कार्य कर रही हैं। इन योजनाओं का मूल उद्देश्य वही है जिसे संत रविदास जी ने अपने जीवन से संदेश दिया था-समाज के अंतिम व्यक्ति तक सम्मान और अवसर पहुँचाना।
बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से सामाजिक न्याय को संस्थागत स्वरूप दिया। उन्होंने ऐसे भारत की कल्पना की जहाँ समान अवसर, समान अधिकार और सामाजिक सम्मान प्रत्येक नागरिक का अधिकार हो। संत रविदास जी के समरस समाज का दर्शन और बाबासाहेब अंबेडकर के सामाजिक न्याय का विचार, दोनों मिलकर आधुनिक भारत की वैचारिक आधारशिला का निर्माण करते हैं।
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार, 12 साल पूर्ण होने पर, संत रविदास और बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी के विचारों को आत्मसात करते हुए देश में सामाजिक समरसता, सामाजिक न्याय और सामाजिक कल्याण को नई गति प्रदान कर रही है। “विकसित भारत 2047” का संकल्प केवल आर्थिक प्रगति का लक्ष्य नहीं है, बल्कि ऐसा भारत बनाने का राष्ट्रीय अभियान है जहाँ प्रत्येक नागरिक को सम्मान, समान अवसर और न्याय प्राप्त हो। यह वही भारत है जिसकी कल्पना संत रविदास जी ने “बेगमपुरा” के रूप में की थी और जिसे बाबासाहेब अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से सामाजिक लोकतंत्र का स्वरूप दिया।
इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए “समरसता संकल्प अभियान” आज केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण का राष्ट्रीय अभियान बन चुका है। यह अभियान समाज को जोड़ने, संत रविदास जी की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुँचाने और सामाजिक समरसता की भावना को सशक्त करने का माध्यम है। जब संत रविदास जी के विचार समाज के व्यवहार का हिस्सा बनेंगे, तभी सामाजिक न्याय की भावना और विकसित भारत का संकल्प वास्तविक अर्थों में साकार होगा ।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम संत रविदास जी को केवल स्मरण न करें, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन, समाज और राष्ट्र निर्माण का आधार बनाएँ। समरसता, समानता, सेवा, श्रम और मानव गरिमा के उनके संदेश ही विकसित, आत्मनिर्भर, समावेशी और शक्तिशाली भारत की सबसे मजबूत नींव हैं। यही “समरसता संकल्प अभियान” का उद्देश्य है और यही विकसित भारत 2047 की दिशा में हमारा राष्ट्रीय संकल्प भी है।








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