— अभिव्यक्ति का उत्सव —
साहित्यिक वर्चस्व, उपेक्षा और सच की अनदेखी परतों को संवेदनशीलता के साथ उजागर करेगी पत्रकार-लेखक विजय विनीत की नई किताब
कोरस–2026 में कलाकार अमित कुमार के तैलचित्रों की प्रदर्शनी ने रचनात्मकता, संवाद और आत्मीयता का एक जीवंत संसार रचा
वाराणसी। हिंदी साहित्य की धुंधली पगडंडियों पर कहीं पीछे छूट गए नामों और प्रसंगों को फिर से उजाले में लाने का एक भावपूर्ण प्रयास रविवार की उस संध्या साकार हुआ, जब पत्रकार एवं लेखक विजय विनीत की नई पुस्तक ‘काशी के कुशवाहा कांत’ के कवर का मड़ौली स्थित मेहता आर्ट गैलरी में लोकार्पण हुआ। साहित्य, कला और शिक्षा जगत की गरिमामयी उपस्थिति ने शब्दों, सुरों और रंगों के उत्सव कोरस–2026 को एक आत्मीय सांस्कृतिक अनुभव में बदल दिया। इसी क्रम में चित्रकार अमित कुमार के तैलचित्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन हुआ, जिसने इस आयोजन को रचनात्मकता की एक और गहराई प्रदान की।
जाने-माने साहित्यकार, कवि और रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल ने पुस्तक ‘काशी के कुशवाहा कांत’ की रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए कहा कि यह कृति हिंदी साहित्य के उस महत्वपूर्ण, किंतु उपेक्षित अध्याय को केंद्र में लाती है, जिसे समय की धूल ने लगभग ढंक दिया था। उनके अनुसार, लेखक ने काशी के इस चर्चित उपन्यासकार के जीवन और रचनात्मक संसार को एक नई, ईमानदार दृष्टि से देखने का साहस किया है। ऐसी दृष्टि, जो सतही चमक से दूर जाकर सच्चाइयों की गहराइयों में उतरती है। साथ ही रहस्य, रूमान और अफवाहों के कुहासे को चीरते हुए कुशवाहा कांत के व्यक्तित्व और सृजन के ठोस आयामों को उजागर करती है। यह केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि साहित्य के भीतर छिपे सवालों की गंभीर पड़ताल है। एक ऐसा दस्तावेज, जो पाठक को ठहरकर सोचने पर मजबूर करता है।
पुस्तक का प्रभावशाली कवर डिजाइन करने वाले प्रतिष्ठित चित्रकार मनीष खत्री की सराहना करते हुए व्योमेश शुक्ल ने यह भी कहा कि आमतौर पर महान साहित्यकारों के इर्द-गिर्द प्रशंसा के एकरंगी आख्यान गढ़े जाते हैं, लेकिन यह पुस्तक जिज्ञासा, जांच और साहस के रास्ते पर चलती है। आज के समय में, जब असुविधाजनक सच्चाइयों से बचने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, विजय विनीत का यह प्रयास विशेष महत्व रखता है। वे निर्भीकता से उन पहलुओं को सामने लाते हैं, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है और कुशवाहा कांत के जीवन प्रसंगों के माध्यम से हिंदी साहित्य में मौजूद वर्चस्व और उपेक्षा की परतों को उजागर करते हैं।
जाने-माने उद्घोषक अशोक आनंद ने कहा कि ‘काशी के कुशवाहा कांत’ में संवेदना और संतुलन का ऐसा सधा हुआ मेल है, जो बिना किसी अतिनाटकीयता के अन्याय, उपेक्षा और सामाजिक विषमताओं की सच्चाइयों को पाठक के सामने रखता है। विजय विनीत की रचनाएं अचानक प्रभाव डालने के बजाय धीरे-धीरे, मगर बहुत गहरे स्तर पर मन को छूती है और पाठक को भीतर से झकझोरते हुए सोचने, महसूस करने और पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र दुबे ने लेखक विजय विनीत की रचनाधर्मिता को रेखांकित किया और चित्रकार अमित कुमार की कला की सराहना की। उन्होंने कहा कि अमित के चित्र केवल देखने का सुख नहीं देते, बल्कि एक गहन आत्मानुभूति का अनुभव कराते हैं। दर्शक जब उनके चित्रों के सामने खड़ा होता है, तो वह केवल रंगों को नहीं, बल्कि अपने ही भीतर चल रहे विचारों और भावनाओं से सामना करता है।
सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. लेनिन ने कहा कि पचास और साठ के दशक में हिंदी उपन्यास के पाठकों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले कुशवाहा कांत को समझने के लिए यह पुस्तक एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदर्भ है। यह केवल साहित्य का अध्ययन नहीं, बल्कि उस दौर की सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक जटिलताओं को समझने का एक संवेदनशील माध्यम भी है। उन्होंने अमित कुमार की कलाकृतियों की सराहना करते हुए कहा कि उनके चित्र केवल कैनवस पर रंगों का संयोजन नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव हैं।
अधिवक्ता मिथिलेश कुशवाहा और सुरेश सिंह ने अमित कुमार के चित्रों को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी भी कलाकार के आंतरिक चिंतन, सामाजिक दृष्टि और आध्यात्मिक गहराई का प्रतिबिंब बनकर उभरता है। उनकी कला में समकालीन जीवन की जटिलताएं, शहरी तनाव, मानवीय संबंधों की उलझनें और अस्तित्व से जुड़े प्रश्न अमूर्त रूप में अभिव्यक्त होते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार डा.अरविंद सिंह ने काशी के कुशवाहा कांत के लेखक विजय विनीत की रचनाधर्मिता और अमित कुमार के चित्रों की गहराई को सराहा। साथ ही यह भी कहा कि अमित अनुभवों को केवल चित्रित नहीं करते, बल्कि उन्हें इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि दर्शक भी उन भावनाओं का सहभागी बन जाता है। उनकी कला यह एहसास कराती है कि चित्र केवल दृश्य नहीं होते-वे संवाद होते हैं, अनुभव होते हैं और कभी-कभी आत्मा की आवाज भी बन जाते हैं।
कोरस–2026 के इस आयोजन में बनारस शहर के गणमान्य नागरिकों, प्रबुद्ध साहित्यकारों, कलाकारों और उद्यमियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। इस अवसर पर प्रमुख उद्यमी उदय राज सिंह, उत्कर्ष गुप्ता, अशोका इंस्टीट्यूट के डीन डा. एसएल कुशवाहा, एक्टिविस्ट वल्लभाचार्य, शैलेश कुमार सिंह, मीनू ग्रोवर, कलाकार धीरेंद्र सिसौदिया समेत बड़ी संख्या में साहित्य और कला प्रेमी उपस्थित थे, जिन्होंने इस शाम को सचमुच एक स्मरणीय अनुभव में बदल दिया। वहां शब्द थे, रंग थे और इन सबके बीच जीवित थी संवेदना। पूरा वातावरण सृजनात्मक ऊर्जा, आत्मीय संवाद और भावनात्मक गहराई से भरा हुआ था, जिसने हर उपस्थित व्यक्ति को भीतर तक स्पर्श किया। यह आयोजन स्मृतियों, सवालों और संवेदनाओं का एक ऐसा संगम था, जिसने उपस्थित हर व्यक्ति को भीतर तक छू लिया।








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