सिस्टम की सेटिंग से अवैध असलहों में वैध कारतूस
असलहे हमेशा से ताकत का पर्याय रहे हैं, इसीलिए तमाम लोगों को इनका शौक भी है। शौक जब सही रास्ते से पूरा न हो तो लोग गलत रास्ते अख्तियार करने में भी गुरेज नहीं करते। यहीं से शुरुआत हुई अवैध असलहों की। अपराध, रंगदारी की दुनिया ही इन अवैध असलहों पर टिकी है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन अवैध असलहों में इस्तेमाल होने वाले कारतूस कहां बनते हैं? जान लीजिये, ये कारतूस पूरी तरह वैध होते हैं और सरकारी फैक्टरियों में तैयार होते हैं। सिस्टम के छेद से निकल कर यही कारतूस जरायम की दुनिया को उसका पसंदीदा लाल रंग देते हैं।
अवैध हथियारों को पकड़ने के लिए पुलिस भले ही सजग होने के दावे करती हो। लेकिन इस बड़े सवाल को हर बार दबा दिया जाता है कि इनके लिए कारतूसों की सप्लाई कहां से हो रही है।
वैध कारतूस बदमाशों तक पहुंचने के पीछे पूरी तरह से प्रशासनिक लापरवाही के साथ ही कुछ शस्त्र विक्रेताओं, शस्त्र लाइसेंस धारियों और पुलिसकर्मियों की साठगांठ सामने आ रही है। अहम बात यह है कि प्रतिबंधित बोर के कारतूसों की सप्लाई भी बिना सरकारी तंत्र की मिली भगत के नहीं हो सकती है।
दौर अब पिस्टल और रिवाल्वर का
युवा वर्ग के लिए जहां पिस्टल और रिवाल्वर रखना स्टेटस सिंबल बन गया है तो बदमाश भी अधिकांश संगीन वारदातों में तमंचे के बजाय पिस्टल और रिवाल्वर प्रयोग कर रहे हैं। लाइसेंस बनने की मुश्किल प्रक्रिया में जब युवा असफल हों जाए है तो फिर इनका रुझान अवैध अस्त्र शस्त्र की ओर हो जाता है

अवैध असलहो कि कीमत भी 25 हजार से लेकर 60 से 70 हजार रुपये तक होती हैं। अधिकांश अवैध पिस्टल .32 बोर की होती है। लेकिन कुछ बदमाशों के पास .30 और 9 एमएम बोर की पिस्टल भी बरामद हो चुकी हैं।
पुलिस जब भी पिस्टल या रिवाल्वर बरामद करती है तो इनके सप्लायर और फैक्ट्री तक पहुंचने के प्रयासों की बात कहकर चुप बैठ जाती है। लेकिन अपराधियों पर शिकंजा कसने के लिए कभी यह जरूरी नहीं समझा जाता कि इन अवैध असलहों के लिए कारतूसों की पूर्ति कहां से होती है
ऐसे होता है कारतूसों का खेल
.32 बोर पिस्टल और रिवाल्वर लाइसेंसशुदा हथियार हैं। प्रावधान है कि इनके लाइसेंस पर एक साल में 200 कारतूस जारी होते हैं। जबकि लाइसेंसधारी एक बार में 100 कारतूस ले सकता है। अधिकांश शस्त्र लाइसेंसधारी अमूमन एक साल में 200 या 100 कारतूसों का प्रयोग नहीं करता है। ऐसे में बदमाश कुछ शस्त्र लाइसेंसधारियों और शस्त्र विक्रेताओं से साठगांठ रखते हैं। जहां पर आपसी मित्रता में बाजार रेट या डेढ़ गुना दाम पर कारतूस बदमाशों को उपलब्ध हो जाते हैं। खेल यहां यह भी है कि रिवाल्वर, पिस्टल के कारतूस महंगे होने के कारण लोग एक बार में ही कारतूस खरीदकर रख लेते हैं। जबकि हर साल उनके लाइसेंस पर कारतूस चढ़ते रहते हैं और अनुमान है कि यही कारतूस बदमाशों की पिस्टल और रिवाल्वर में प्रयोग होते हैं।

प्रतिबंधित बोर में पुलिस की साठगांठ
9 एमएम का असलहा प्रतिबंधित बोर है और यह सिर्फ पुलिस, पीएसी जैसी आर्म्ड फोर्स के पास ही होता है। इस कारतूस की सप्लाई भी सीधे इन्हीं विभागों को होती है। बाजार में यह कारतूस उपलब्ध नहीं है। विश्वस्त सूत्रों की मानें तो कई भ्रष्ट पुलिस वालों के बदमाशों से गहरे संपर्क हैं, जो कई बार सामने भी आ चुके हैं। ऐसे ही पुलिस वाले इन बदमाशाें को कारतूस उपलब्ध कराते हैं।
शासन के नियम का कड़ाई से अनुपालन जरूरी
कारतूसों की कालाबाजारी रोकने और बदमाशों तक कारतूस न पहुंचें, इसके लिए कुछ वर्षों पहले शासन ने निर्देश जारी किए थे। जिसमें यदि कोई शस्त्र लाइसेंसधारक कारतूस लेता है तो उसे दस कारतूस लेने के लिए कम से कम 8 कारतूसों के खोखे शस्त्र विक्रेता को जमा कराने होंगे, तभी उसे कारतूस दिए जाएंगे। इसके बाद डीएम के अधीन शस्त्र अनुभाग समय-समय पर इसकी जांच करके सत्यापन भी करेगा।
इस नियम का कड़ाई से पालन हो तो वैध कारतूस अवैध होने से बच सकते है








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