जल शक्ति: विकसित भारत की यात्रा को दे रही है गति– सी. आर. पाटिल
क्या आप जानते हैं कि जल जीवन मिशन दुनिया का सबसे बड़ा ग्रामीण पेयजल आपूर्ति कार्यक्रम है? या फिर स्वच्छ भारत मिशन दुनिया का सबसे बड़ा ग्रामीण स्वच्छता अभियान है, जिसने लोगों की सोच और व्यवहार में अभूतपूर्व बदलाव लाया है? और क्या आपको पता है कि नमामि गंगे आज दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी नदी पुनर्जीवन योजनाओं में शामिल है?

ये सभी पहल केवल सरकारी योजनाएं नहीं हैं, बल्कि इस बात का उदाहरण हैं कि 145 करोड़ आबादी वाला भारत किस तरह पानी की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
जब इतिहासकार भारत की विकास यात्रा को देखेंगे, तो संभव है कि वे पिछले 12 वर्षों को वह दौर बताएं, जब ‘जल’ देश के विकास का सबसे महत्वपूर्ण विषय बन गया। मानव सम्मान, आर्थिक विकास, जनस्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण संरक्षण पर पानी जितना प्रभाव डालता है, उतना शायद ही कोई दूसरा क्षेत्र डालता हो। लेकिन कई दशकों तक भारत में जल संबंधी समस्याओं का समाधान अलग-अलग और बिखरे हुए तरीकों से किया जाता रहा। पिछले कुछ वर्षों में सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए एकीकृत, गंभीर और दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाया गया, जिसका नेतृत्व स्वयं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने किया।
पिछले 12 वर्षों में जल क्षेत्र में जितने बड़े पैमाने पर निवेश और काम हुआ है, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। लेकिन इस बदलाव की अहमियत केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। आज पानी को पूरे देश की साझा प्राथमिकता माना जा रहा है, जिसमें सभी विभाग, राज्य, समुदाय और आने वाली पीढ़ियाँ भागीदार हैं। पहले जल क्षेत्र को उतनी प्राथमिकता नहीं मिलती थी, लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने जल क्षेत्र की योजना, प्रबंधन और सेवाओं से जुड़ी वर्षों पुरानी कमियों को दूर करने की जिम्मेदारी उठाई।
इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण जल जीवन मिशन है। जब यह मिशन शुरू हुआ था, तब केवल लगभग 3.23 करोड़ ग्रामीण परिवारों, यानी करीब 17 प्रतिशत ग्रामीण घरों में ही नल से जल की सुविधा थी। आज 15.8 करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवारों, यानी 81 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण घरों तक नल से पानी पहुँच चुका है। सरकार का लक्ष्य 2028 तक 100 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को यह सुविधा उपलब्ध कराना है। लाखों परिवारों, खासकर महिलाओं और बच्चों के लिए यह केवल पानी की सुविधा नहीं है, बल्कि उनके जीवन में आया एक बड़ा बदलाव है।
अध्ययनों के अनुसार, पहले भारत की ग्रामीण महिलाओं को हर साल पानी लाने में अरबों घंटे खर्च करने पड़ते थे। अब घर-घर नल से पानी पहुंचने के कारण हर दिन 5.5 करोड़ से अधिक व्यक्ति-घंटों की बचत हो रही है। जो समय पहले पानी लाने में लगता था, अब उसका उपयोग पढ़ाई, रोजगार, बच्चों की देखभाल और आय बढ़ाने वाले कामों में हो रहा है। साथ ही, सुरक्षित पेयजल मिलने से पानी से फैलने वाली बीमारियाँ कम हुई हैं, जिससे लोगों का इलाज पर होने वाला खर्च भी घटा है। इसी तरह स्वच्छ भारत मिशन ने भी देश में बड़ा बदलाव लाया है। इस अभियान ने दिखाया कि लोगों की सोच में बदलाव, जनभागीदारी और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति मिलकर बड़े स्तर पर परिवर्तन ला सकती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकलन के अनुसार, स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की वजह से 2014 से अक्टूबर 2019 के बीच दस्त से होने वाली 3 लाख से अधिक मौतों को रोका जा सका। घर-घर शौचालय बनने से करोड़ों ग्रामीण महिलाओं को सम्मान, निजता और सुरक्षा मिली। इस तरह स्वच्छता केवल एक सुविधा नहीं रही, बल्कि जनस्वास्थ्य और सामाजिक सम्मान का एक बड़ा जनआंदोलन बन गई। गांवों को खुले में शौच से मुक्त बनाने के बाद अब देश स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) 2.0 के तहत ठोस और तरल कचरे के वैज्ञानिक एवं टिकाऊ प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
भारत ने जल संरक्षण और भूजल रिचार्ज के क्षेत्र में भी दुनिया के सबसे बड़े अभियानों में से एक चलाया है। 6 सितंबर 2024 को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सूरत से “जल संचय जन भागीदारी” अभियान की शुरुआत की थी। इसके तहत 31 मई 2026 तक देशभर में 1.55 करोड़ से अधिक वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्ज संरचनाओं का निर्माण किया जा चुका है। यह अभियान दिखाता है कि जल संरक्षण में लोगों की भागीदारी और सामूहिक प्रयास कितने प्रभावी हो सकते हैं।
इन प्रयासों का सकारात्मक असर अब भूजल की स्थिति में भी दिखाई देने लगा है। हाल के आकलनों के अनुसार, देश के कई हिस्सों में भूजल का स्तर बेहतर हुआ है और जिन क्षेत्रों में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा था, उनकी संख्या में भी कमी आई है। यह इस बात का प्रमाण है कि लगातार किए गए जल संरक्षण के प्रयास और जनभागीदारी मिलकर पर्यावरण पर बढ़ते दबाव को भी कम कर सकते हैं।
साथ ही, भारत ने लंबे समय से लंबित राष्ट्रीय जल परियोजनाओं को भी तेज़ी से आगे बढ़ाया है। देश की पहली बड़ी नदी जोड़ो परियोजना, केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना, तेजी से आगे बढ़ रही है। इसका उद्देश्य बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित क्षेत्रों तक पानी पहुंचाना है। इसके अलावा, राज्यों के भीतर नदियों को जोड़ने की कई परियोजनाओं में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में नमामि गंगे कार्यक्रम ने यह साबित किया है कि पर्यावरण संरक्षण और विकास साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं।
पिछले एक दशक में 4,260 मिलियन लीटर प्रतिदिन(एमएलडी) सीवेज शोधन क्षमता विकसित की गई है। अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों से निकलने वाला जैविक प्रदूषण (बीओडी) 2017 में 26 टन प्रतिदिन से घटकर 2024 में 10.75 टन प्रतिदिन रह गया है। वहीं, उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी (एफ्लुएंट) का उत्सर्जन भी 349 एमएलडी से घटकर 265.56 एमएलडी हो गया है।
आज निगरानी के आंकड़े बताते हैं कि गंगा नदी में सभी निगरानी केंद्रों पर पानी का पीएच स्तर और घुली हुई ऑक्सीजन (डीओ) स्नान योग्य मानकों के अनुरूप है। इसके अलावा, देशव्यापी आकलन के अनुसार गंगा में लगभग 6,324 गंगा डॉल्फ़िन पाई गई हैं, जो नदी के बेहतर होते पर्यावरणीय स्वास्थ्य का संकेत है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत की जल यात्रा दुनिया के लिए भी एक महत्वपूर्ण सीख बनकर सामने आई है। 21वीं सदी की जल संबंधी चुनौतियों का समाधान अलग-अलग प्रयासों से नहीं हो सकता। पेयजल, स्वच्छता, नदियों का संरक्षण, सिंचाई की बेहतर व्यवस्था, भूजल रिचार्ज, इस्तेमाल किए गए पानी का दोबारा उपयोग और जलवायु परिवर्तन से निपटने की तैयारी—इन सभी को एक-दूसरे से जुड़ी व्यवस्था के रूप में देखना होगा।
जलवायु परिवर्तन के दौर में यह समग्र दृष्टिकोण और भी ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि दुनिया भर में जल संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। भारत के सामने यह चुनौती और भी बड़ी है। दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, लेकिन देश के पास दुनिया के कुल मीठे पानी के संसाधनों का केवल लगभग 4 प्रतिशत ही है।
तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण, औद्योगिक विकास और बदलते मौसम के पैटर्न आने वाले वर्षों में इन जल संसाधनों पर और अधिक दबाव डालेंगे। इसलिए आज जल क्षेत्र में किया जा रहा निवेश केवल विकास पर होने वाला खर्च नहीं है, बल्कि देश को भविष्य की चुनौतियों के लिए मजबूत बनाने में किया जा रहा दीर्घकालिक निवेश है। पिछले एक दशक में मिली सफलता यह दिखाती है कि जब निस्वार्थ नेतृत्व, जवाबदेह शासन और जनता की सक्रिय भागीदारी एक साझा राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए साथ आते हैं, तो बड़े और सकारात्मक बदलाव संभव हो जाते हैं।
जैसे-जैसे भारत विकसित भारत की ओर आगे बढ़ रहा है, जल उसकी विकास यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है। जल सुरक्षित भारत का मतलब केवल सभी को पर्याप्त पानी उपलब्ध कराना नहीं है। इसका अर्थ है महिलाओं का सम्मान, परिवारों का बेहतर स्वास्थ्य, किसानों की अधिक उत्पादकता, शहरों का टिकाऊ विकास और आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण का संतुलन बनाए रखना।
पिछले 12 वर्षों में भारत के जल क्षेत्र में जो बड़ा बदलाव आया है, वह प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व का प्रमाण है। उनके संकल्प ने पानी को केवल एक विकास संबंधी चुनौती नहीं रहने दिया, बल्कि उसे राष्ट्र निर्माण और विकसित भारत का एक मजबूत माध्यम बना दिया।
आगे की राह में लगातार प्रयास करना आवश्यक होगा। इसमें तकनीक, आंकड़ों और नवाचार की बड़ी भूमिका रहेगी। हमारा लक्ष्य सभी क्षेत्रों में पानी के बेहतर और कुशल उपयोग को बढ़ावा देना, इस्तेमाल किए गए पानी का पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण बढ़ाना, स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन को मजबूत करना और जल संरक्षण में आम नागरिकों की भागीदारी बढ़ाना है।
(लेखक भारत सरकार में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री हैं।)








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