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नागरिकों और व्यवसायों को सहूलियत – डिजिटल इंडिया की 11 वर्षों की विरासत

नागरिकों और व्यवसायों को सहूलियत – डिजिटल इंडिया की 11 वर्षों की विरासत
 लेखक– एस. कृष्णन, सचिव, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), भारत सरकार

 

सिर्फ एक दशक पहले तक उत्तर प्रदेश के दूरदराज के किसी गांव में किसान को सब्सिडी हासिल करने या उपज बढ़ाने के बारे में सलाह लेने के लिए कागजों के ढेर में सिर खपाना पड़ता था। उस जमाने में कतार में खड़ा होना रिवाज जैसा था। लेकिन आज वह किसान किसी दलाल के बिना ही फसल के बारे में सहायता पा सकता है और सब्सिडी भी सीधे उसके बैंक खाते में जमा हो जाती है।
मौजूदा समय में किसी भी गली से गुजरते हुए आप एक खामोश क्रांति को महसूस कर सकते हैं। एक ऐसी क्रांति जिसने जीने की सहूलियत को बुनियादी तौर पर बदल दिया है। पहले किसी फल बेचने वाले या तिपहिया चालक को लेनदेन नकद में करनी पड़ती थी। लेकिन अब वह गर्व से अपनी ठेली या ऑटोरिक्शा से झूलते क्यूआर कोड की ओर इशारा कर देता है।
102.86 करोड़ नागरिकों के डिजिटल जुड़ाव ने भारत को सशक्त बनाया है। देश में 99.56 करोड़ ब्रॉडबैंड ग्राहकों के विशाल समुदाय से इसे मदद मिली है। मोबाइल डाटा की 8 से 10 रुपए प्रति जीबी की कीमत बेहद किफायती है। लिहाजा, प्रति व्यक्ति मासिक डाटा खपत 24.01 जीबी के असाधारण स्तर पर पहुंच चुकी है। इस डिजिटल बुनियाद ने नागरिकों और सरकार के बीच रिश्ते को पूरी तरह से बदल दिया है। यह रिश्ता विश्वास, पारदर्शिता और डिजिटल स्वायत्तता पर टिका हुआ है।
फासले को मिटाने वाला सेतु
इस क्रांति का पहला कदम पहुंच का लोकतांत्रीकरण तथा एक ऐसा मजबूत और स्वदेशी डिजिटल पहचान फ्रेमवर्क बनाना था जो प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता की गारंटी करे। ‘भारतनेट’ कार्यक्रम को बड़े पैमाने पर लागू किया गया और इसने लगभग 2.2 लाख ग्राम पंचायतों को तेज रफ्तार ब्रॉडबैंड से जोड़ दिया। इस तरह, इसने सुनिश्चित किया कि आर्थिक अवसरों की राह में भौगोलिक स्थितियां अवरोध नहीं बनें।
144 करोड़ से ज्यादा आधार पहचानों के सृजन के साथ अवसंरचना की छलांग ने ‘जनधन’, ‘आधार’ और ‘मोबाइल’ (जैम) की तिकड़ी को ईंधन प्रदान किया। सरकार संप्रभु डिजिटल पहचान फ्रेमवर्क का इस्तेमाल करते हुए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के जरिए नागरिकों को 51.5 लाख करोड़ रुपए सफलतापूर्वक हस्तांतरित कर चुकी है। इस प्रणाली ने धन की बर्बादी और बिचौलिए की जरूरत को प्रभावी ढंग से खत्म कर दिया है। इसने करोड़ों परिवारों के हाथों में वित्तीय स्वायत्तता सौंप कर उनकी जिंदगी की सहूलियत में नाटकीय सुधार किया है।
डीपीआईः रोजमर्रा की जिंदगी और उद्यम का कायाकल्प
बुनियाद तैयार हो जाने के बाद भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआई) ने समस्याएं सुलझाने के लिए हल तैयार कर नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी बदल दी है। ‘डिजिलॉकर’ जैसे प्लेटफॉर्मों ने नागरिकों और व्यवसायों के लिए प्रक्रियाओं को बेहद सुचारू बना दिया है। ‘डिजिलॉकर’ के पंजीकृत उपयोगकर्ताओं की संख्या 70 करोड़ से ज्यादा है और उनके 900 करोड़ से ज्यादा दस्तावेज इस प्लेटफॉर्म पर हैं। इसने कागजी कार्रवाइयों को खत्म कर केवाईसी प्रक्रियाओं और दस्तावेज सत्यापन को फौरन पूरा करना संभव बनाया है। इससे उद्यमों के लिए खर्च और समय में काफी कटौती हुई है। बैंकों, दूरसंचार सेवा प्रदाताओं और वित्तप्रौद्योगिकी संस्थानों को ग्राहकों का सत्यापन करने में कई दिनों के बजाय अब सिर्फ कुछ पल ही लगते हैं।
सरकार ने ‘गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस’ (जेम) के ज़रिए 19.51 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की खरीद की है। यह छोटे मैन्युफैक्चरर या पहली बार काम करने वाले विक्रेता के लिए, बिचौलियों के बिना सरकारी अनुबंध हासिल करने में बेहतर व्यावसायिक अवसर प्रदान करता है।
दूरदराज से सार्वजनिक सेवाओं का लाभ उठाने के लिए, ‘उमंग’ एप्लिकेशन ने केंद्र और राज्य सरकार की सेवाओं को सीधे नागरिकों की पहुँच में ला दिया है। यह ऐप अब 11.6 करोड़ से अधिक पंजीकृत उपयोगकर्ताओं को सेवाएँ दे रहा है, जिसके ज़रिए 2,572 सरकारी सेवाओं का लाभ उठाया जा सकता है और इससे अब तक 797.84 करोड़ से अधिक लेनदेन किए जा चुके हैं।
इस पूरे इकोसिस्टम की सबसे अहम चीज़ ‘यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस’ (यूपीआई) है। सड़क के किनारे ठेली लगाने वाले फल विक्रेता को सहूलियत देने वाला क्यूआर कोड एक संप्रभु भुगतान प्रणाली है जिस पर रोजाना 75 करोड़ लेनदेन होते हैं। आज, दुनिया भर में होने वाले कुल तुरंत किये जाने वाले डिजिटल भुगतानों में से लगभग आधे अकेले भारत में होते हैं और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भी यूपीआई को दुनिया की सबसे बड़ी तुरंत भुगतान प्रणाली के रूप में मान्यता दी है।
यह उन 24 देशों के लिए बेहद ज़रूरी हो गया है, जिनके साथ भारत ने अपने डिजिटल गवर्नेंस प्लेटफ़ॉर्म को अपनाने और उसी तरह की भुगतान प्रणाली तैयार करने के लिए औपचारिक रूप से समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अलावा, यूपीआई अब संयुक्त अरब अमीरात (यूएइ), सिंगापुर और फ्रांस सहित 9 देशों में काम कर रहा है।
प्रौद्योगिकी को एक ‘जन-हित की चीज़ मानने की यह सोच सीधे तौर पर स्वास्थ्य के क्षेत्र में समानता और लोगों के जीवन को आसान बनाने से जुड़ी है। ई-संजीवनी प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए, भारत ने 48 करोड़ से ज़्यादा मुफ़्त टेली-परामर्श की सुविधाएँ दी हैं, जिससे दूर-दराज़ और कम सुविधा वाले इलाकों के मरीज़ भी विशेषज्ञ डॉक्टरों से सलाह ले सकते हैं।
इसी तरह, दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान एक स्वदेशी प्लेटफॉर्म द्वारा संचालित किया गया था। ‘कोविन’ के माध्यम से 220 करोड़ से अधिक कोविड-19 वैक्सीन की खुराक दी गई और उनका पारदर्शी रूप से ट्रैक रखा गया। इसने एक ऐसा मजबूत डिजिटल ढांचा तैयार किया जिसका अध्ययन दुनिया भर की स्वास्थ्य प्रणालियों ने किया।
भविष्य पर निगाह
डिजिटल इंडिया के 11वें वर्ष के समापन के साथ, यह मिशन अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों की ओर मजबूती से अग्रसर है, इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इनका उपयोग भारत और विकासशील देशों की चुनौतियों को हल करने के लिए सार्वजनिक हित के रूप में किया जाए।
सालों तक, कंप्यूटिंग पावर की भारी लागत ने छोटे शहरों के प्रतिभावान युवा नवोन्मेषकों को उन्नत प्रौद्योगिकी से दूर रखा। ‘इंडियाएआई’ मिशन के तहत, भारत स्टार्टअप्स के लिए व्यापार करने की सुगमता को बढ़ाने के लिए इस बाधा को व्यवस्थित रूप से दूर कर रहा है। सरकार ने सभी की पहुँच को आसान बनाने के लिए एक विशाल, साझा कंप्यूटिंग सुविधा स्थापित की है। देश के घरेलू स्टार्टअप्स और छात्रों को महज 65 रुपये प्रति घंटे की दर से विश्व स्तरीय कंप्यूटिंग क्षमता प्रदान करके, इसका उद्देश्य जमीनी स्तर  पर नवोन्मेष को बढ़ावा देना है। हमारा लक्ष्य अपने प्रतिभाशाली कार्यबल के दम पर भारत को दुनिया की ‘एआई एप्लीकेशन का केंद्र बनाना है, जो देश-विदेश के सभी क्षेत्रों में सेवा वितरण को बेहतर  बना सके और उद्यमों की उत्पादकता को बढ़ा सके।
इसके साथ ही, भारत अपने हार्डवेयर के भविष्य को भी सुरक्षित कर रहा है। ‘सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम’  के तहत, देश भर में 1.65 लाख करोड़ रुपये के निवेश वाली 12 सेमीकंडक्टर निर्माण और पैकेजिंग परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है। इसी गति को आगे बढ़ाते हुए, केंद्रीय बजट 2026-27 में ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ (आइएसएम) 2.0 की घोषणा की गई है। यह नया चरण केवल निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि सेमीकंडक्टर उपकरणों और सामग्रियों पर ध्यान केंद्रित करने, पूर्ण भारतीय बौद्धिक संपदा को डिजाइन करने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने पर केंद्रित है। इस योजना के तहत 24 सेमीकंडक्टर डिज़ाइन स्टार्टअप्स को मंजूरी मिलने के साथ, भारत तेजी से अपनी क्षमता निर्माण को गहन प्रौद्योगिकी कौशल में बदल रहा है। यह एक जीवंत घरेलू फैबलेस इकोसिस्टम को बढ़ावा दे रहा है, जो आधुनिक दुनिया को चलाने वाली चिप्स को डिजाइन करता है।
इस पहल की असली विरासत उस देश की सोच में है जो अब नवोन्मेष, बिना रुकावट व्यावसायिक संचालन और शासन को अपनी उंगलियों पर पाना चाहता है। यह सुनिश्चित करके कि प्रौद्योगिकी सबको साथ लाने, आसानी से उपलब्ध होने और संप्रभु ताकत का ज़रिया बने, ‘डिजिटल इंडिया’ चुपचाप उस ‘विकसित भारत’ की नींव रख रहा है जिसका सपना हमने 2047 के लिए देखा है।

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Author: Liveupweb

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