धर्मेंद्र प्रधान के स्तीफ़े से आखिर छात्रों को क्या मिला , हर्ष दुबे का वायरल मिडिया में वायरल
छात्र हर्ष दुबे का यह बयान इस समय सोशल मीडिया पर प्रचंड रूप से वायरल हो रहा है, जिसने देश के शिक्षा तंत्र और आरक्षण व्यवस्था की कड़वी सच्चाई पर एक तीखी बहस छेड़ दी है।
हर्ष दुबे ने व्यवस्था पर करारा प्रहार करते हुए कहा:
“क्या शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा दे देने भर से छात्र आत्महत्या करना बंद कर देंगे? बिल्कुल नहीं! क्योंकि धर्मेंद्र प्रधान जाएंगे तो कोई और आएगा, लेकिन तंत्र तो वही रहेगा।”
हर्ष ने आगे कहा कि देश में आत्महत्या करने वाले 90% छात्र सामान्य वर्ग (General Category) से आते हैं, जो आरक्षण की मार झेल रहे हैं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि इस देश का मीडिया और नेता असली मुद्दे—यानी आरक्षण—पर बात करने से कतराते हैं।
“सच्चे छात्रों पर लाठियाँ, उपद्रवियों को छूट”
जब पत्रकार ने जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शनों पर सवाल उठाया, तो हर्ष का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने कहा:
असली छात्रों का दमन: जब हम जैसे वास्तविक नीट छात्र अपने हक के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हैं, तो सरकार अपनी पुलिस से हम पर बर्बर लाठीचार्ज करवाती है और खदेड़ देती है।
उपद्रवियों को शह: वहीं दूसरी ओर, जो देशद्रोही, आतंकवादी और उपद्रवी तत्व देश में आतंक फैलाने और हिंसा करने उतरते हैं, सरकार उनके आगे-पीछे घूमती है और उन्हें प्रदर्शन के नाम पर पूरी छूट देती है।
अपने फटे हुए बनियान की तरफ इशारा करते हुए हर्ष ने अत्यंत भावुक होकर कहा:

“मैं अपनी फटी हुई बनियान छुपाकर केवल अपनी इज्जत ढकने के लिए आपके न्यूज़ रूम में बैठा हूँ। हम नीट के छात्रों के पास अमेरिका जाने तो क्या, सही से पढ़ाई करने तक के पैसे नहीं हैं। लेकिन एक व्यक्ति अमेरिका से आता है, छात्रों के नाम पर उपद्रव फैलाता है, और सरकार उसके आगे नतमस्तक हो जाती है।”
योग्यता की हत्या और सामान्य वर्ग की पीड़ा
हर्ष का स्पष्ट कहना है कि इस देश की सबसे बड़ी समस्या आरक्षण है।
दिन-रात की मेहनत का शून्य परिणाम: सामान्य वर्ग के बच्चे और उनके माता-पिता जानते हैं कि उन्हें न कोई स्कॉलरशिप मिलनी है, न किसी सरकारी योजना का लाभ। पिता कर्ज लेकर पढ़ाता है, बच्चा दिन-रात एक करके 90% नंबर लाता है।
आरक्षण का खेल: दूसरी तरफ, 40-50 नंबर लाने वाले या लगभग खाली कॉपी छोड़ने वाले को आसानी से सीट और नौकरी दे दी जाती है, जबकि 90% वाले मेधावी छात्र को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
शांत रहने की सजा: देश का 80% पढ़ा-लिखा युवा सामान्य वर्ग से आता है। वह कभी सड़कें नहीं जाम करता, कभी देश की संपत्ति में आग नहीं लगाता और शांति से अपनी लड़ाई लड़ता है। इसी शालीनता की सजा आज इस देश का सामान्य वर्ग भुगत रहा है।
आज इस देश की “योग्यता” (Merit) आत्महत्या कर रही है, लेकिन वोट बैंक की राजनीति में अंधी हो चुकी सरकारों को यह चीख सुनाई नहीं दे रही।
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