Home » Uncategorized » 22-23 सितंबर 1998 की वह रात…जब नवगठित यूपी एसटीएफ ने दुर्दांत हत्यारे श्रीप्रकाश शुक्ला को मार गिराया था….

22-23 सितंबर 1998 की वह रात…जब नवगठित यूपी एसटीएफ ने दुर्दांत हत्यारे श्रीप्रकाश शुक्ला को मार गिराया था….

22-23 सितंबर 1998 की वह रात…जब नवगठित यूपी एसटीएफ ने दुर्दांत हत्यारे श्रीप्रकाश शुक्ला को मार गिराया था….

बाईस सितंबर 1998 की शाम ढल रही थी। दिल्ली-एनसीआर की सीमा पर गाजियाबाद का इलाका सामान्य दिख रहा था, पर हवा में तनाव तैर रहा था। उत्तर प्रदेश पुलिस की नवगठित स्पेशल टास्क फोर्स यानी एसटीएफ के जवान चुपचाप तैनात थे। उनका लक्ष्य सिर्फ एक था—श्री प्रकाश शुक्ला।  गोखपुर के मामखोर गांव का यह युवक महज चौबीस-पच्चीस साल का था, पर पूरे प्रदेश का सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुका था। हत्या, अपहरण, रंगदारी और सुपारी किलिंग—उसके नाम दर्जनों मामले थे।

 

सबसे खतरनाक बात यह कि उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को मारने की सुपारी ले रखी थी। पुलिस प्रशासन कांप रहा था। इसलिए 4 मई 1998 को खासतौर पर उसे पकड़ने या खत्म करने के लिए यूपी एसटीएफ का गठन किया गया था।

महीनों की मेहनत, मोबाइल सर्विलांस, गुप्त सूचनाएं और लंबी निगरानी के बाद आखिरकार वह पल आ पहुंचा था।  श्री प्रकाश उन दिनों दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में छिपा घूम रहा था। उसी रात वह अपनी प्रेमिका से मिलने गाजियाबाद आया था। नीली सिएलो कार में वह बैठा था। कार दिल्ली-गाजियाबाद हाईवे की ओर बढ़ रही थी। एसटीएफ को पहले से सूचना मिल चुकी थी। टीम ने मोहन नगर फ्लाईओवर और इंदिरापुरम इलाके के आसपास जाल बिछा रखा था।  जब कार सुनसान हिस्से में पहुंची, तो अचानक एसटीएफ की गाड़ियों ने उसे घेर लिया। लाउडस्पीकर से सरेंडर का आदेश दिया गया। श्री प्रकाश ने समझ लिया—अब भागने का कोई रास्ता नहीं। उसने तुरंत हथियार निकाला और फायरिंग शुरू कर दी। “जो पहली गोली मारे, वही बादशाह”—उसकी यही सोच थी। गोलियों की आवाज रात के सन्नाटे को चीरती हुई गूंज उठी।

 

एसटीएफ के जवानों ने जवाबी कार्रवाई की। दोनों तरफ से गोलियां चलीं। कुछ ही पलों में सब खामोश हो गया।  जब धुआं छंटा, तो कार के अंदर श्री प्रकाश शुक्ला की लाश पड़ी थी। श्री प्रकाश शुक्ला, जिसने यूपी और बिहार में दहशत का साम्राज्य खड़ा कर लिया था, वहीं ढेर हो गया था। पुलिस को उसके पास से हथियार बरामद हुए। वह फानी दुनिया से रुखसत हो चुका था।

 

यह मुठभेड़ सिर्फ एक अपराधी की मौत नहीं थी। यह उस युग का अंत था जिसमें बाहुबली और माफिया खुलेआम सत्ता को चुनौती देते थे। एसटीएफ के जवानों की बहादुरी और सटीक प्लानिंग ने उस रात इतिहास लिख दिया। मुख्यमंत्री की सुरक्षा की चिंता कुछ हद तक कम हुई और प्रदेश में कानून का डंका फिर से बजने लगा।

आज जब बाईस-तेईस सितंबर की रात याद की जाती है, तो दिमाग में वही तस्वीर आती है—अंधेरी सड़क, नीली कार, गोलियों की आवाज और एक नाम का हमेशा के लिए खामोश हो जाना। श्री प्रकाश शुक्ला की कहानी आगाज से अंजाम तक वहीं खत्म हो गई थी, जहां उसने खुद को अजेय समझा था।

Liveupweb
Author: Liveupweb

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *