वीवीआईपी कल्चर बदलना होगा, वरना रास्ते भी सवाल पूछेंगे
जनता को परेशानी में डालकर आखिर किस बात का वीवीआईपी सम्मान ?
लोकतंत्र में सत्ता जनता की सेवा के लिए होती है, जनता को अपने ही रास्तों पर बेबस करने के लिए नहीं। लेकिन जब वीवीआईपी संस्कृति के नाम पर सड़कें रोक दी जाती हैं, यातायात का पहिया थाम दिया जाता है और आम आदमी को घंटों इंतजार करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, तब सवाल उठना लाजिमी है—क्या लोकतंत्र में आम आदमी की हैसियत सिर्फ टैक्स चुकाने और परेशानी सहने तक सीमित रह गई है?
वीवीआईपी कल्चर बदलना होगा, क्योंकि सड़कें किसी की निजी जागीर नहीं, जनता की साझा संपत्ति हैं..
एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें युवा अपने बाप के खोने की बात करते हुए पुलिस से वार्ता कर रहा है घंटों यातायात बाधित कर लोगों की समस्या को व्यवस्था का शिकार बनाया जाता है !
एक तरफ मरीज अस्पताल पहुंचने के लिए जूझता है, कोई छात्र परीक्षा केंद्र तक पहुंचने की चिंता में परेशान होता है, कोई कर्मचारी समय पर काम पर पहुंचने के लिए रास्ता तलाशता है और कोई परिवार अपनी जरूरी यात्रा पूरी करने के लिए जाम में फंसा रहता है। दूसरी तरफ काफिले की सुविधा के लिए रास्ते रोक दिए जाते हैं। सवाल यह है कि आम नागरिक के समय, जरूरत और परेशानी की कीमत कौन चुकाएगा ?
क्या किसी पद पर बैठ जाने से जनता के अधिकार छोटे हो जाते हैं? क्या किसी वीवीआईपी के गुजरने से पहले सड़क पर चलने वाले प्रत्येक नागरिक को अपनी जरूरतें भूल जाना चाहिए? और क्या जनप्रतिनिधियों को यह याद दिलाने की जरूरत है कि जिस जनता के बीच से वे चुनकर आते हैं, उसी जनता के रास्ते रोककर वे आखिर किस लोकतांत्रिक मर्यादा का पालन कर रहे हैं?
सवाल पूछना जनता का अधिकार है, एहसान नहीं..
सबसे गंभीर स्थिति तब पैदा होती है, जब जनता की परेशानी पर सवाल उठाने वालों को ही गलत ठहराने की कोशिश होने लगती है। सवाल पूछना विरोध नहीं, लोकतंत्र की बुनियादी ताकत है। जनता यह जानना चाहती है कि सुरक्षा के नाम पर यातायात कितनी देर रोका जाएगा, वैकल्पिक रास्तों की व्यवस्था कौन करेगा और आपातकालीन सेवाओं को निर्बाध रास्ता देने की जिम्मेदारी किसकी होगी ?

अगर जनता सवाल पूछने लगे और जवाब देने के बजाय उसे ही चुप कराने की कोशिश हो, तो समझिए समस्या सिर्फ यातायात की नहीं, व्यवस्था की सोच की भी है।
सुरक्षा जरूरी है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर आम नागरिक की सुविधा को पूरी तरह नजरअंदाज करना किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। प्रोटोकॉल हो, लेकिन उसके साथ जवाबदेही भी हो। काफिला निकले, लेकिन मरीज की एंबुलेंस न फंसे। व्यवस्था चले, लेकिन जनता का जीवन ठप न हो!
जब रास्ते ही सवाल पूछने लगें, तब जवाब कौन देगा?
याद रखिए, सड़कें सिर्फ गाड़ियों के गुजरने का माध्यम नहीं हैं; वे आम आदमी की रोजी-रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन की रफ्तार से जुड़ी हैं। इन रास्तों पर किसी का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सभी का अधिकार है।
वीवीआईपी संस्कृति की असली पहचान यह नहीं होनी चाहिए कि किसी के आने पर कितनी सड़कें खाली करा दी गईं, कितनी देर यातायात रोका गया या कितने लोगों को इंतजार कराया गया। असली पहचान तो यह होनी चाहिए कि किसी विशिष्ट व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए आम नागरिक को कम से कम परेशानी कैसे दी गई।
अब समय आ गया है कि वीवीआईपी कल्चर की समीक्षा हो








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