इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा स्ट्रीट वेंडरों के मामले में पारित नवीनतम आदेश ने एक बार फिर यह उजागर कर दिया है कि वाराणसी में नगर निगम और पुलिस प्रशासन ने गरीब मेहनतकश रेहड़ी-पटरी व्यापारियों के साथ कानून के बजाय दमन का रास्ता अपनाया है।
यह अत्यंत गंभीर विषय है कि जिन पंजीकृत स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका की रक्षा के लिए संसद ने *स्ट्रीट वेंडर्स (जीविका संरक्षण एवं सड़क विक्रय विनियमन) अधिनियम, 2014* बनाया और जिनके संबंध में उच्च न्यायालय पहले ही स्पष्ट निर्देश दे चुका था कि विधि के अनुसार ही कार्रवाई की जाएगी, उन्हीं वेंडरों को कथित रूप से बिना समुचित प्रक्रिया अपनाए हटाया गया। अब न्यायालय ने राज्य सरकार से अभिलेख सहित यह स्पष्ट करने को कहा है कि संबंधित वेंडरों को वेंडिंग जोन में स्थान आवंटित था या नहीं तथा उनके दस्तावेजों की वास्तविक स्थिति क्या है।
यह आदेश स्वयं इस बात का संकेत है कि प्रशासन के दावों और वेंडरों द्वारा प्रस्तुत अभिलेखों के बीच गंभीर अंतर मौजूद है, जिसकी न्यायिक जांच आवश्यक है। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ होता तो बार-बार न्यायालय को हस्तक्षेप करने और प्रशासन से स्पष्टीकरण मांगने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती?
वाराणसी नगर निगम और पुलिस प्रशासन को यह समझना होगा कि गरीब की रोज़ी-रोटी पर हमला किसी भी शहर को स्मार्ट नहीं बनाता। शहर की सुंदरता के नाम पर मेहनतकशों को उजाड़ना विकास नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय है। फुटपाथ पर अपना परिवार पालने वाले लोगों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार लोकतांत्रिक शासन की पहचान नहीं हो सकता।
हम मांग करते हैं कि—
* सभी पंजीकृत स्ट्रीट वेंडरों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
* उच्च न्यायालय के निर्देशों का अक्षरशः पालन किया जाए।
* नगर निगम और पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
* जब तक न्यायिक प्रक्रिया पूरी न हो, तब तक किसी भी वैध वेंडर के उत्पीड़न और बेदखली पर रोक लगाई जाए।
* नगर निगम टाउन वेंडिंग कमेटी को सक्रिय कर कानून के अनुरूप वेंडिंग जोन की व्यवस्था लागू करे।

लोकतंत्र में कानून से ऊपर कोई नहीं है—न नगर निगम, न पुलिस प्रशासन। गरीब की आजीविका पर बुलडोज़र चलाने की बजाय संविधान और कानून के शासन को लागू करना ही प्रशासन का दायित्व है। हमें विश्वास है कि न्यायालय के हस्तक्षेप से स्ट्रीट वेंडरों को न्याय मिलेगा और प्रशासन को भी कानून के दायरे में जवाबदेह होना पड़ेगा।
हाईकोर्ट के इस जनपक्षधर दखल पर BHU अस्पताल के सड़क किनारे पटरी व्यवसायियों के आंदोलन की अगुवाई कर रहे डॉ धनञ्जय त्रिपाठी और विनय शंकर राय मुन्ना ने हर्ष व्यक्त किया है और प्रशासन से अपील की है अविलंब आदेश का अनुपालन करते हुए वेंडरों का उत्पीड़न बंद हो और उन्हें रोजगार करने की अनुमति दी जाए। और इतने दिनों तक इस मामले में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों और पुलिसकर्मियों पर अनुशासनात्मक कार्यवाही करें।







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