भब्यता और दिब्यता के साथ मानेगा वाराणसी का रथयात्रा मेला 10 लाख से ज्यादा भक्तो के आने की संभावना
श्री जगन्नाथ महाप्रभु की पावन आन-यात्रा, अनवसर तीला (भगवान् जब बीमार होकर 14 दिनों के लिए अज्ञातवास में चले जाते हैं) एवं भव्य रथयात्रा महोत्सव-2026
वाराणसी, 25 जून 2026
हम अत्यंत श्रद्धा, विश्वास एवं सनातन धर्म के प्रति अटूट समर्पण भाव के साथ समस्त काशीवासियों, श्रद्धालु भक्तों एवं धर्मप्रेमी जनों के लिए यह प्रेस विज्ञप्ति प्रेषित कर रहे हैं।
वाराणसी (काशी), भारत की प्राचीनतम सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक नगरी, आज भी अपनी गौरवशाली परंपराओं, ऐतिहासिक विरासत एवं सनातन पहचान को अक्षुण्ण बनाए हुए है। इस पावन नगरी के कण-कण में सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति एवं आध्यात्मिक चेतना का दिव्य स्वरूप समाहित है।
काशी को धर्म की राजधानी कहा जाता है, जहाँ द्वादश ज्योतिर्लिंगों, चार धामों एवं 51 शक्तिपीठों के सांकेतिक स्वरूप विद्यमान हैं।
असंख्य प्राचीन मंदिर इस भूमि को अत्यंत पवित्र, धार्मिक एवं सांस्कृतिक रूप से विशिष्ट बनाते हैं।

यह पावन भूमि उन ऐतिहासिक प्रयासों की साक्षी रही है जिनके माध्यम से भारत की सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण एवं पुनर्जागरण हुआ है। काशी की सनातन सांस्कृतिक चेतना सदैव शैव एवं वैष्णव परंपराओं के समन्वय से आलोकित रही है। उत्तर में विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग, मध्य में भगवान बिंदुमाधव एवं दक्षिण में श्री जगन्नाथ महाप्रभु मंदिर यह त्रिकोणीय आध्यात्मिक संरचना काशी की आत्मा का दिव्य स्वरूप प्रस्तुत करती है।
भगवान श्रीजगन्नाथ महाप्रभु, जिनका अर्थ “विश्व के स्वामी है, भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप माने जाते हैं। उनकी आराधना का प्रमुख केंद्र ओडिशा स्थित पुरी धाम है, किंतु काशी में भी उनकी उपासना अत्यंत श्रद्धा एवं परंपरा के साथ की जाती है। सनातन परंपरा में भगवान श्रीजगन्नाथ महाप्रभु को कलियुग का प्रत्यक्ष देवता माना जाता है।
वाराणसी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर, असि को श्रीक्षेत्र पुरी धाम का प्रतीकात्मक स्वरूप माना जाता है, ऐसी मान्यता है की यहाँ दर्शन मात्र से श्रीक्षेत्र पुरी धाम के दर्शन का पूर्ण फल (प्राप्त होता है, जहाँ भगवान श्रीजगन्नाथ, भगवान बलभद्र एवं देवी सुभद्रा की विधिवत पूजा-अर्चना होती है। काशी की गौरवशाली शैव एवं वैष्णव परंपराओं का अद्वितीय समन्वय यहाँ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है, जो इस पावन स्थल को अत्यंत विशेष एवं आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है।
ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, काशी में प्रभु श्रीजगन्नाथ का दिव्य विग्रह सन् 1790 ईस्वी में पुरी के तत्कालीन मुख्य पुजारी पंडित स्वामी तेजोनिधि ब्रह्मचारी द्वारा प्रतिष्ठित किया गया था। भोंसले राज्य के दीवान पंडित बेनीराम शापुरी तथा कटक रियासत के दीवान पंडित विश्वंभर शापुरी द्वारा इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया, जो आज भी गंगा तट स्थित असि घाट पर श्रद्धा एवं भक्ति का प्रमुख केंद्र है।
इसी परंपरा को अक्षुण्ण रखते हुए सन् 1802 ईस्वी से निरंतर श्री जगन्नाथ रथयात्रा मेला का आयोजन शापुरी वंशजों द्वारा श्रद्धा, सेवा एवं भक्ति भाव से किया जाता रहा है।
प्रत्येक वर्ष भगवान श्रीजगन्नाथ महाप्रभु भगवान बलभद्र एवं देवी सुभद्रा रथ पर आरूढ़ होकर भक्तों को दर्शन देते हैं। यह रथयात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, लोक परंपरा एवं सनातन आस्था का भव्य उत्सव है।
इस वार्षिक रथमात्रा महोत्सव में असंख्य श्रद्धालु, संत, विद्वान एवं काशीवासी सम्मिलित होकर दिव्यता, एकात्मता एवं सांस्कृतिक गौरव का अनुभव करते हैं। प्रमुख कार्यक्रम
स्रान-यात्रा एवं जलाभिषेक पर्व
दिनांक : 29 जून 2026 (ज्येष्ठ पूर्णिमा)
समय : प्रातः 5:11 बजे से
वाराणसी
सूर्योदय के शुभ अवसर पर भगवान श्री जगन्नाथ महाप्रभु, भगवान बलभद्र एवं देवी सुभद्रा का दिव्य महास्त्रान एवं जलाभिषेक संपन्न होगा। इस अवसर पर श्रद्धालु स्वयं भगवान के जलाभिषेक में सहभागी होकर पुण्य लाभ प्राप्त कर सकेंगे।
अनवसर काल (भगवान् जब बीमार होकर 14 दिनों के लिए अज्ञातवास में चले जाते हैं) एवं औषधीय काढ़ा प्रसाद वितरण
30 जून 2026 से 14 जुलाई 2026 तक
महास्नान के उपरांत भगवान श्री जगन्नाथ महाप्रभु अनवसर (विश्राम) काल में विराजमान रहेंगे। इस अवधि में भगवान के स्वास्थ्य लाभहेतु पारंपरिक औषधीय काढ़ा तैयार किया जाएगा, जिसे प्रतिदिन श्रद्धालुओं के मध्य प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाएगा।
नवयौवन दर्शन
14 जुलाई 2026
अनवसर काल की पूर्णता के पक्षात भगवान श्री जगन्नाथ महाप्रभु भक्तों को नवयौवन स्वरूप में प्रथम दर्शन देंगे। यह दर्शन अत्यंत दुर्लभ एवं मंगलकारी माना जाता है। इस दिन भगवान को परवल का जूस भोग के रूप में दिया जाता है।
भव्य डोली यात्रा
15 जुलाई 2026
मंगला आरती: प्रातः 5:15 बजे
डोली सज्जा: अपराह्न 3:00 बजे
डोली यात्रा प्रस्थान: सायं 4:00 बजे
यात्रा मार्गः
श्री जगन्नाथ मंदिर (असि चौराहा) दुर्गाकुंड नवाबगंज राम मंदिर कश्मीरीगंज खोजवां शंकुलधारा बैजनत्था एवं कामाक्षा मंदिर मार्ग पं. बेनीराम बाग (रथयात्रा क्षेत्र)
ऐतिहासिक रथयात्रा मेला
16 जुलाई 2026 से 18 जुलाई 2026 तक
भगवान श्री जगन्नाथ, भगवान बलभद्र एवं देवी सुभद्रा रथ पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देंगे।
16 जुलाई (द्वितीया) – प्रातः 5:00 बजे आरती एवं दर्शनन्, मध्यान्ह 12:00 बजे भोग आरती के पश्चात् पट बंद, अपरान्ह 3:00 बजे आरती के साथ दर्शन प्रारंभ, रात्रि 8:00 बजे शायं आरती, रात्रि 12:00 बजे आरती।
17 जुलाई (तृतीया) – प्रातः 5:00 बजे आरती एवं दर्शन, मध्यान्ह 12:00 बजे भोग आरती के पश्चात् पट बंद, अपरान्ह 3:00 बजे आरती के साथ दर्शन प्रारंभ, रात्रि 8:00 बजे शायं आरती, रात्रि 12:00 बजे आरती।
18 जुलाई (चतुर्थी) – प्रातः 5:00 बजे आरती एवं दर्शन, मध्यान्ह 12:00 बजे भोग आरती के पश्चात् पट बंद, अपरान्ह 3:00 बजे आरती के साथ दर्शन प्रारंभ, रात्रि 8:00 बजे शायं आरती, रात्रि 12:00 बजे आरती।
18 जुलाई रात्रि 12:00 बजे महाआरती के साथ मेले का समापन होगा।
बहुड़ा यात्रा एवं मंदिर प्रत्यावर्तन
19 जुलाई 2026
भगवान श्री जगन्नाथ महाप्रभु पुनः अपने असि स्थित मंदिर में पधारेंगे।
20 जुलाई 2026 से
नियमित दर्शन एवं पूजा-अर्चना पुनः प्रारम्भ होगी।
अध्यक्ष का संदेश
ट्रस्ट श्री जगन्नाथ जी, असि, वाराणसी के अध्यक्ष श्री बृजेश सिंह ने कहा-
“भगवान श्री जगन्नाथ महाप्रभु की रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि काशी की जीवंत सांस्कृतिक विरासत एवं सामाजिक समरसता का महापर्व है। यह पर्व हमें सेवा, प्रेम, भक्ति एवं लोककल्याण की भावना से जोड़ता है। मैं समस्त काशीवासियों एवं श्रद्धालुओं से आग्रह करता हूँ कि वे इस पावन महोत्सव में सहभागी बनकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करें तथा धर्म एवं संस्कृति की इस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दें।”
विशेष अनुरोध
सभी श्रद्धालुओं, भक्तगणों एवं काशीवासियों से विनम्र निवेदन है कि वे अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होकर भगवान श्री जगन्नाथ महाप्रभु के दर्शन, पूजन एवं सेवा का लाभ प्राप्त करें तथा इस दिव्य महोत्सव को सफल एवं भव्य बनाने में सहयोग प्रदान करें।
स्थान : श्री जगन्नाथ मंदिर, असि, वाराणसी








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