April 15, 2026 9:26 am

Home » राजनीति » बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की 135वीं जयंती पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी

बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की 135वीं जयंती पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी

बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की 135वीं जयंती पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी

अप्रैल 14, 2026

वाराणसी।
भारत रत्न  बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की 135 वीं जयंती के अवसर पर  काशी हिंदू विश्वविद्यालय पत्रकारिता एवं जनसम्प्रेषण विभाग द्वारा दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
“बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की पत्रकारिता का पुनरावलोकन: सामाजिक
न्याय और भारतीय समाज का रूपांतरण” विषय पर आयोजित यह संगोष्ठी ऑनलाइन माध्यम से संपन्न हुई, जिसमें देश-विदेश से लगभग 400 प्रतिभागियों ने सहभागिता किया।
अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ सर्व धर्म प्रार्थना से हुआ तत्पश्चात आयोजन सचिव डॉ. बाला लखेन्द्र ने संगोष्ठी की रूपरेखा विस्तार से प्रस्तुत की।
विभागाध्यक्ष प्रो. ज्ञान प्रकाश मिश्रा ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया।

उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, बिहार के कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र राय ने कहा कि समाज में दबे-कुचले और हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज को मुखर करने के लिए डॉ. आंबेडकर ने पत्रकारिता को एक प्रभावी माध्यम बनाया। ‘मूकनायक’, ‘बहिष्कृत भारत’ और ‘जनता’ जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से वंचित वर्गों की पीड़ा और संघर्ष को सामने लाने का उल्लेख किया। वर्तमान समय में जब मीडिया के एक हिस्से में तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति देखी जा रही है, तब आंबेडकर की पत्रकारिता हमें सत्य, साहस और सामाजिक उत्तरदायित्व का संदेश देती है। पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता के अनुसार सूचना को बदलना नहीं, बल्कि सत्य के पक्ष में खड़े रहना है।

 

मुख्य वक्ता इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक और आईआईएमसी के पूर्व महानिदेशक प्रो केजी सुरेश ने कहा कि सीमित संसाधनों, सत्ता के विरोध और सामाजिक अवरोधों के बावजूद आंबेडकर ने पत्रकारिता को जनमत निर्माण का सशक्त उपकरण बनाया। मात्र 29 वर्ष की आयु में ‘मूकनायक’ के संपादन से उन्होंने अपनी पत्रकारिता यात्रा प्रारंभ की, जो आगे चलकर ‘बहिष्कृत भारत’ (1927), ‘जनता’ (1930) और ‘प्रबुद्ध भारत’ (1956) तक पहुंची। अपने लेखन के माध्यम से उन्होंने रूढ़िवाद और जातिवाद पर तीखा प्रहार किया।

आंबेडकर ने पत्रकारिता को कभी व्यवसाय नहीं बनाया, बल्कि इसे सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना। “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो” का उनका संदेश आज भी समाज को दिशा प्रदान करता है। शिक्षा में महिलाओं की भूमिका पर बल देते हुए कहा कि यदि एक महिला शिक्षित होती है, तो एक पूरी पीढ़ी शिक्षित होती है।

आज की पत्रकारिता को आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या वह वास्तव में समाज के बेजुबान और वंचित वर्गों की आवाज बन पा रही है। सामाजिक सरोकार, समावेशिता और सौहार्द को बढ़ावा देने वाली पत्रकारिता समय की आवश्यकता है। संविधान लागू होने के दशकों बाद भी सामाजिक न्याय के क्षेत्र में अनेक चुनौतियां बनी हुई हैं।

नेपाल की पूर्व विदेश मंत्री और यू न वूमेन की सदस्य डॉ बिमला राय ने कहा कि पत्रकारिता जनमत और नीतियों को प्रभावित करने की शक्ति रखती है। जिम्मेदार और जवाबदेह पत्रकारिता तटस्थ नहीं रह सकती, बल्कि उसे समाज को जागरूक करना चाहिए।

मलेशिया विश्वविद्यालय की प्रो. शेरोन विल्सन ने वैश्विक संदर्भ में पत्रकारिता की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संचार माध्यम समाज को दिशा देने की क्षमता रखते हैं।

‘कम्युनिकेशन टुडे’ के मुख्य संपादक प्रो. संजीव भनावत नहीं बाबा साहब अंबेडकर की पत्रकारिता के विविध आयामों को रेखांकित करते हुए उसके गंभीरतापूर्वक अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया।

अंतरराष्ट्रीय जर्नल आईआईएसआर के मुख्य संपादक प्रोफेसर असित कुमार दास ने कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज में सकारात्मक बदलाव लाना है और इसके लिए आंबेडकर के विचार आज भी मार्गदर्शक हैं।

महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता संस्थान के पूर्व निदेशक प्रो. ओ.पी. सिंह, आईएमटी भुवनेश्वर के निदेशक प्रोफेसर श्रीकांत पटनायक, पब्लिक रिलेशन सोसाइटी ऑफ़ इंडिया के वाराणसी के अध्यक्ष श्री अनिल जाजोदिया,  यूथ एशिया नेपाल के अध्यक्ष डॉ संतोष शाह, त्रिभुवन विश्वविद्यालय काठमांडू के प्रोफेसर कुंदन आर्यन, बांग्लादेश के डॉ जुड़े विलियम ज्ञानिलो , प्रोफेसर अनुराग दवे, प्रोफेसर अनिल कुमार उपाध्याय सहित अनेक अंतर्राष्ट्रीय शिक्षाविदों ने अपने विचार व्यक्त किए।

अध्यक्षता करते हुए कला संकाय प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने “समाज एक नाव के समान है” का उल्लेख करते हुए कहा कि सभी वर्गों के संतुलित सहयोग से ही समाज प्रगति कर सकता है।
इस संगोष्ठी में यह स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया कि बाबासाहेब आंबेडकर की पत्रकारिता केवल ऐतिहासिक विरासत नहीं, बल्कि आज की मीडिया के लिए एक नैतिक मार्गदर्शिका है, जो सत्य, साहस और सामाजिक न्याय के मूल्यों को सुदृढ़ करती है। विभिन्न सत्रों में देश विदेश के प्रतिभागियों द्वारा कुल 55  शोध पत्रों का वाचन किया गया। शेष शोध पत्रों का वाचन कल के विविध सत्रों में किया जाएगा समापन सत्र मुख्य अतिथि होंगे कुश भाव ठाकरे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मनोज दयाल।

Liveupweb
Author: Liveupweb

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *