April 15, 2026 9:26 am

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भारत की औषधि रणनीति पैमाने से नवाचार की ओर बढ़ रही है, ताकि देश को बायोफार्मा और उच्च-मूल्य वाले चिकित्सा विज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके

भारत की औषधि रणनीति पैमाने से नवाचार की ओर बढ़ रही है, ताकि देश को बायोफार्मा और उच्च-मूल्य वाले चिकित्सा विज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके

– जगत प्रकाश नड्डा

वैश्विक स्तर पर, कुल औषधि राजस्व में बायोलॉजिक, बायोसिमिलर और विशेष दवाओं की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक हो गयी है। लंबे समय से जेनरिक दवाओं में अग्रणी देश होने के कारण ‘विश्व की फ़ार्मेसी’ के रूप में प्रसिद्ध भारत का औषधि उद्योग अब पैमाने से नवाचार की ओर आगे बढ़ने के लिए तैयार है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, भारत सरकार भविष्य के अनुरूप एक नीतिगत रूपरेखा को गति दे रही है, ताकि देश जेनरिक दवाओं में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखते हुए इन उभरते क्षेत्रों में अधिक हिस्सेदारी प्राप्त कर सके।
केंद्रीय बजट 2026-27 में ₹10,000 करोड़ के मिशन बायोफार्मा निर्माण शक्ति की घोषणा इस दिशा में एक निर्णायक कदम को रेखांकित करती है। यह अगले 8 से 10 वर्षों में भारत को बायोफार्मा नवाचार और उच्च मूल्य वाली चिकित्सा सेवाओं के वैश्विक केन्द्र बनाने के देश के संकल्प का संकेत देती है। यह विज़न गहरी वैज्ञानिक क्षमताओं के निर्माण, नवाचार-आधारित उद्यमों को बढ़ावा देने और भारत को अगली पीढ़ी की दवाओं के क्षेत्र में एक अग्रणी देश के रूप में उभरने में सक्षम बनाने पर आधारित होगा।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य बायोलॉजिक्स, बायोसिमिलर और उन्नत चिकित्सीय क्षेत्रों में घरेलू क्षमताओं को गति देना है। यह कार्यक्रम औषधि विभाग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग और जैव प्रौद्योगिकी विभाग की मौजूदा पहलों का पूरक है, जैसे फार्मा मेडटेक क्षेत्र में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देना (पीआरआईपी), अनुसंधान विकास और नवाचार योजना, बायोनेस्ट आदि, जिनका उद्देश्य जैव- औषधि समेत जीवन विज्ञान क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देना है। ये पहलें भारत के नवाचार इकोसिस्टम को मजबूत करने, उद्योग-अकादमी सहयोग को बढ़ावा देने तथा जेनेरिक दवाओं से नवाचार संचालित दवा अनुसंधान और विकास की ओर बदलाव को सक्षम करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।
इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ किण्वन-आधारित निर्माण क्षमताओं का विकास करना है। एंटिबायोटिक, वैक्सीन, एंज़ाइम और बायोलॉजिक्स के निर्माण में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका के बावजूद, यह क्षेत्र लंबे समय से आयात पर निर्भर रहा है। अवसंरचना में निवेश करके, प्रौद्योगिकी विकास और हस्तांतरण को सुविधाजनक बनाकर तथा लक्षित प्रोत्साहन प्रदान करके, भारत इस रणनीतिक क्षेत्र में घरेलू क्षमता का निर्माण करने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए काम कर रहा है।
भारत के नैदानिक अनुसंधान इकोसिस्टम का विस्तार भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। 1,000 मान्यता प्राप्त नैदानिक प्रयोग केंद्र स्थापित किये जायेंगे, जो वैश्विक दवा विकास गंतव्य के रूप में भारत की स्थिति को बेहतर बनायेंगे। अपनी लागत लाभ और कुशल शोधकर्ताओं की बढ़ती संख्या के साथ, भारत कुशल और उच्च गुणवत्ता वाले नैदानिक प्रयोग के लिए असाधारण अवसर प्रदान करता है। साथ ही, नियामक व्यवस्था को मजबूत करने और संस्थागत क्षमताओं को बढ़ाने से भारत की मौजूदा व्यवस्था वैश्विक मानकों के अधिक अनुरूप होगी, जिससे तेज अनुमोदन संभव होंगे और वैश्विक हितधारकों के बीच विश्वास बढ़ेगा।
पिछले कुछ वर्षों में, भारत ने पीएलआई और थोक दवा (बल्क ड्रग) पार्क योजनाओं के सहारे सक्रिय औषधि सामग्री (एपीआई) और मुख्य आरंभिक सामग्रियों (केएसएम) के स्थानीय उत्पादन में तेज़ी से प्रगति हुई है। इससे देश में दवाओं की कीमतें घटाने में मदद मिली है, जो विश्व स्तर पर सबसे कम कीमतों में से एक है और इसके कारण नागरिकों के लिए स्वास्थ्य देखभाल की लागत किफायती बनी रहती है। प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना ने सस्ती कीमतों पर गुणवत्ता युक्त जेनेरिक दवाओं तक पहुंच का विस्तार किया है, जिसके तहत 19,000 से अधिक जनऔषधि केंद्र लाखों लोगों की सेवा कर रहे हैं। कैंसर और दुर्लभ रोगों की दवाओं जैसी महत्वपूर्ण चिकित्सा प्रक्रियाओं पर सीमा-शुल्क को सुव्यवस्थित करने जैसे पूरक उपाय जीवन रक्षक उपचारों तक पहुंच को और सुलभ बना रहे हैं। जैसे-जैसे उन्नत चिकित्सा प्रक्रियाएं अधिक व्यापक होंगी, किफायती दर और समान पहुंच सुनिश्चित करना केंद्रीय नीति की प्राथमिकता बनी रहेगी।

 


जैसे-जैसे उद्योग विकसित हो रहा है, भारत का उद्देश्य न केवल स्थापित बाजारों में बल्कि उभरते क्षेत्रों में, विशेष रूप से नवाचार-संचालित क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति को मजबूत करना है। सुधार, इस बदलाव के केंद्र में हैं। नियामक समन्वय, अनुमोदन प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण और तेजी से मंजूरी जैसे प्रयास व्यापार करने में आसानी को बढ़ा रहे हैं। गुणवत्ता मानकों और नियामक प्रक्रियाओं को सुदृढ़ बनाने से भारतीय औषधि उत्पादों पर वैश्विक विश्वास की निरंतरता सुनिश्चित होती है। हालांकि, आरएंडडी निवेश बढ़ाना एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है। इसका समाधान करने के लिए, सार्वजनिक-निजी सहयोग को मजबूती देना आवश्यक होगा, ताकि दीर्घकालिक नवाचार को बनाए रहा जा सके।
नीतिगत समर्थन, तकनीकी प्रगति और बाजार का आपसी समन्वय; औषधि क्षेत्र के लिए विकास का एक अद्वितीय अवसर प्रस्तुत करता है। भारत का घरेलू बाजार, जिसका मूल्य पहले से ही ₹4 लाख करोड़ से अधिक है, निरंतर विस्तार के लिए तैयार है। अगले दशक में, भारत न केवल जेनेरिक दवाओं में एक अग्रणी देश के रूप में, बल्कि नवोन्मेषी दवाओं, किण्वन-आधारित उत्पादों और अगली पीढ़ी की चिकित्सा-सेवाओं में भी एक शक्तिशाली केंद्र के रूप में उभरने के लिए बेहतर स्थिति में है।
निष्कर्ष के तौर पर, भारत का औषधि क्षेत्र नए चरण में प्रवेश कर रहा है, जो नवाचार, सुदृढ़ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा द्वारा परिभाषित होता है। बायोफार्मा शक्ति कार्यक्रम जैसी पहलों, नैदानिक अवसंरचना के विस्तार और लक्षित निर्माण प्रोत्साहनों के समर्थन से, भारत धीरे-धीरे मात्रा-संचालित जेनेरिक दवा केंद्र से उच्च-मूल्य वाले बायोफार्मा नवाचार अग्रणी देश की ओर आगे बढ़ रहा है। यह परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य देखभाल में भारत की भूमिका को मजबूत करने और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विज़न, विकसित भारत 2047 के व्यापक लक्ष्यों को हासिल करने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा।
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(लेखक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन और उर्वरक मंत्री हैं)

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Author: Liveupweb

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