वाराणसी: मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने खारिज की पूजा मौर्य की याचिका, पुलिस अधिकारियों पर FIR दर्ज करने की मांग हुई थी
वाराणसी: वाराणसी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए पूजा मौर्य नामक महिला द्वारा दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया है। यह मामला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(4) के तहत दायर किया गया था, जिसमें स्थानीय पुलिस और कुछ निजी व्यक्तियों पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। अदालत में बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक शंकर तिवारी ने पक्ष रखा।

क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता पूजा मौर्य ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उनके भाई को एक सोची-समझी साजिश के तहत फर्जी मामले में फँसाया गया है। याचिका में आरोप लगाया गया था कि भेलूपुर थाना क्षेत्र के कुछ पुलिसकर्मियों और निजी व्यक्तियों (राहुल उर्फ मटरू, आरती देवी व अन्य) ने मिलकर उसके भाई के खिलाफ झूठी प्राथमिकी (FIR) दर्ज करवाई और उसे शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। पूजा मौर्य का दावा था कि घटना के समय उनके भाई के पक्ष में सीसीटीवी फुटेज और लोकेशन डेटा जैसे ठोस साक्ष्य मौजूद थे, जिन्हें पुलिस ने जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने मामले में निष्पक्ष जांच और आरोपी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग की थी।
पुलिस और अदालत का पक्ष
पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में इन आरोपों का खंडन किया है। पुलिस का कहना है कि पंकज मौर्य (याचिकाकर्ता के भाई) के खिलाफ आरती देवी की शिकायत पर 07.01.2026 को धारा 109(2) और 352 के तहत FIR दर्ज की गई थी। पुलिस का स्पष्ट कहना है कि जांच के दौरान सभी साक्ष्यों को संकलित किया गया और कानून के अनुसार आरोप पत्र (चार्जशीट) न्यायालय में पहले ही दाखिल कर दिया गया है।
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि आरोप में शामिल पुलिसकर्मी लोक सेवक (Public Servants) हैं, जिनके खिलाफ अभियोजन चलाने के लिए कानूनन पूर्व अनुमति (Sanction) की आवश्यकता होती है, जो इस मामले में नहीं ली गई है।
याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रही कि कोई संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) हुआ है जिसके लिए न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।
न्यायालय का आदेश
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सभी तथ्यों और दलीलों को सुनने के बाद पूजा मौर्य की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि चूंकि उचित प्रक्रिया और अभियोजन स्वीकृति का पालन नहीं हुआ, इसलिए यह प्रार्थना पत्र सुनवाई योग्य नहीं है।







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