‘सत्या फाउंडेशन’ दिवाली दीपक का त्यौहार, पटाखे छोड़कर प्रदुषण न करे
दीपावली दीयों का त्यौहार है। पटाखे जला कर हमें फायर ब्रिगेड विभाग का कार्य नहीं बढ़ाना है। पटाखे जला कर हमें अस्पतालों में भीड़ नहीं बढ़ानी है। गुरुवार को वाराणसी के महमूरगंज इलाके में एक होटल में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से आम जनता को यह संदेश दिया है ‘सत्या फाउंडेशन’ ने. बिना किसी सरकारी या विदेशी अनुदान के, प्रदूषण के खिलाफ अभियान चलाने वाली राष्ट्रीय संस्था, ‘सत्या फाउंडेशन’ के संस्थापक सचिव, चेतन उपाध्याय ने बताया कि डीजे और पटाखे के कारण खुशी का हर उत्सव, मातम और दुःख में बदलता जा रहा है. उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष 2025 में वाराणसी के दारानगर इलाके में तेज आवाज के पटाखे से हृदय गति रुक जाने के कारण, एडवोकेट प्रहलाद तिवारी जी की मृत्यु हो गई थी और इस तरह की तमाम घटनाएं पूरे देश में होती रहती हैं जिसकी जानकारी कई बार, पुलिस और आम जनता तक नहीं पहुंच पाती. आगजनी की घटनाओं के मद्देनजर, पड़ोसी देश चीन ने अपने सभी बड़े शहरों में आतिशबाजी पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है. सिक्किम राज्य से प्रेरणा लेते हुए पूरे भारत देश में पटाखों के उत्पादन और बिक्री पर 365 दिन का पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए.. और जब तक ऐसा प्रतिबंध नहीं लगता है , पुलिस-प्रशासन को इतना तो करना ही चाहिए कि रात 10 बजे के बाद पटाखा जलाने वालों की धरपकड़ और मुकदमा करने के लिए सभी थाना क्षेत्रों में उड़ाका दलों को सक्रिय किया जाए ताकि प्रदूषण की मात्रा को कम किया जा सके।
पूर्वांचल के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ, डॉ. अजय कुमार पाण्डेय ने बताया कि पटाखों से निकलने वाला वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण हम सभी के लिए बहुत नुकसानदायक है. अतः केवल दीपावली नहीं बल्कि शादी-विवाह या किसी भी खुशी के उत्सव या त्योहार में पटाखों के प्रयोग से बचना चाहिए.
बनारस बार एसोसिएशन के अध्यक्ष, एडवोकेट विनोद कुमार शुक्ला ने कहा कि एक बार बाजार में पटाखा आने के बाद उसे नियंत्रित करना बहुत ही मुश्किल हो जाता है. अतः पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना ही समस्या का सही समाधान है. उन्होंने आगे कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को शांतिपूर्ण और स्वस्थ माहौल में रहने का अधिकार देता है। जानलेवा डीजे और जहरीले पटाखे का मुद्दा पार्टियों के चुनवी घोषणा पत्र में होना चाहिए और डीजे तथा पटाखा को बढ़ावा देने की बात करने वाले राजनेताओं का बहिष्कार होना चाहिए।
अपरिहार्य कारणों से ऐन वक्त पर प्रेस वार्ता में नहीं पहुंच पाने वाले, काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष, श्री अरुण कुमार मिश्रा ने अपने लिखित संदेश में कहा कि ‘सत्या फाउंडेशन’ के इस अभियान में सभी को अपना योगदान करना पड़ेगा और त्याग की शुरुआत अपने घर से करनी होगी.
रामनगर औद्योगिक एसोसिएशन के अध्यक्ष, श्री देव भट्टाचार्य ने कहा कि हम सभी को अपने स्व-विवेक का उपयोग करते हुए पटाखों से खुद को और अपने बच्चों को बचाने के लिए प्रयास करना पड़ेगा. बारुद और गंधक वाले पटाखों और बमों के इस्तेमाल का अधिकार केवल देश की मिलिट्री (सेना) तक ही सीमित रहना चाहिए। आगे कहा कि काशी के लोग बहुत बुद्धिमान हैं और पटाखे पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाने की माँग को स्वीकार करना देश के नेताओं की नैतिक जिम्मेदारी है।
किसी समय बनारस के एसपी रह चुके, पूर्व आईपीएस श्री जुगुल किशोर बुंदेला ने कहा कि ‘सत्या फाउंडेशन’ के इस नि:स्वार्थ अभियान का सभी वर्ग के लोगों को समर्थन करना चाहिए। पर्यावरण को ठीक करने का जिम्मा केवल एक संस्था का नहीं है बल्कि यह कार्य पूरे समाज का है और सभी लोग धर्म में आ रही इन विकृतियों से मर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ग्रीन पटाखे के पीछे का काला सच सभी को जानना चाहिए। विभिन्न शोधों में यह बात सामने आई है कि ग्रीन पटाखे के जलने पर बेहद छोटे आकार के अल्ट्रा फाइन पार्टिकल्स (अत्यंत बारीक कण) निकलते हैं। सामान्य कणों की तुलना में ये बारीक प्रदूषक, सांस के जरिए फेफड़ों की गहराई तक और खून में बहुत आसानी से प्रवेश कर जाते हैं।
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अन्य महत्वपूर्ण वक्तव्य, जो आकर्षक रंगीन बैनर के रूप में प्रेस वार्ता हाल में लगाए गए थे:-
दीपावली के नाम पर दीपमालिका और यह दीपमालिका तो वातावरण के शोधन के लिए है, शास्त्र सम्मत पर्व है। उसका लौकिक फल- वायुमण्डल का शोधन है। लेकिन आजकल जितना वायुमंडल का दोहन किया जा रहा है, दीपावली के नाम पर वायुमंडल को विकृत किया जा रहा है। एक शिष्टमंडल होना चाहिए होना जो परम्परा प्राप्त, शास्त्रीय विधा के अनुसार हर पर्व-त्यौहार को मनायें। ऐसा न हो कि पर्व त्यौहार के नाम पर विभीषिका फैले। दीपावली के नाम पर कई व्यक्ति और बच्चे अंधे हो जाते हैं, कई लंगड़े हो जाते हैं और अंत में वातावरण बहुत ही मलिन (गंदा) हो जाता है। तो शुचिता और शास्त्र सम्मत शुद्धता, पूजन में और पर्व त्यौहार में बनी रहे, इसका ध्यान रखना चाहिए।
– शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी, श्री गोवर्धन मठ, पुरी पीठ
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मुझे आश्चर्य होता है कि सुप्रीम कोर्ट को केवल दिल्ली का प्रदूषण दिखाई पड़ता है जबकि पटाखों के कारण केवल दिल्ली ही नहीं पूरे देश की आबो-हवा पर प्रभाव पड़ता है. पटाखों के जानलेवा प्रदूषण से जनता को बचाने के लिए सरकार और सुप्रीम कोर्ट को साहसिक कदम उठाने होंगे.
– शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी, ज्योतिष पीठ
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पहले के जमाने में पटाखा जलाने से दमा रोगियों और आम जन को कम दिक्कत होती थी क्योंकि पेड़ पौधे सारे ध्वनि और वायु प्रदूषण को सोख लेते थे। मगर जनसँख्या नियंत्रण कानून के अभाव में कंक्रीट के जंगल बढ़ते गए और पेड़ पौधे कटते गए और आज हालत यह हो गयी कि वाराणसी जैसे शहर में हरियाली का प्रतिशत 1% से भी कम है और घर घर में लोग भयंकर बीमारियों से जूझ रहे हैं। एक दिन के शौक के चलते पूरे 4 दिनों तक अस्थमा के मरीज छटपटाते रहते हैं और पटाखों के चलते हर साल सभी अस्पतालों के आईसीयू और वार्ड फुल हो जाते हैं। जिस पटाखे के चलते इतनी अधिक तकलीफ और साल दर साल इतनी अधिक मौतें होती हैं, वह पटाखा किसी भी धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता। लिहाजा पटाखे को धर्म से जोड़ने की भूल न करें।

पटाखों के चलते नवजात शिशुओं, गर्भवती महिलाओं, वृद्धों और यहां तक कि पालतू पशु पक्षी भी बुरी तरह से परेशान हो जाते हैं, किसी भी निजी अथवा सार्वजनिक उत्सव में पटाखों का बिल्कुल प्रयोग न करें ।








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